Thursday, 9 February 2017

शाहरुख़ नहीं, रईस !!

रईस में शाहरुख़ नहीं, शाहरुख़ में रईस हैं। और ये कारनामा करने वाले खुद शाहरुख़ हैं। इस लिहाज से उनका ये बोल्ड स्टेप है। वही बोल्ड स्टेप जो उन्होंने बाज़ीगर में तब लिया था जब वो एस्टेब्लिश्ड नहीं थे और उनके सामने फिल्म में नवाज़ुद्दीन भी नहीं थे, जिन्होंने आधे से ज़्यादा फिल्म में रईस को दबाये रखा। शाहरुख़ तो खुद फिल्म ख़त्म होने से करीब आधे घंटे पहले तक रईस से दबे हुए थे।
ये फिल्म क़ायदे से शाहरुख़ की थी भी नहीं। फायदे की भी नहीं थी। जो लोग फिल्म में शाहरुख़ को देखने गए, उन्हें रईस मिला तपाक से और जो रईस को देखने गए, उन्हें न तो पूरा रईस ही मिला और न ही पूरा शाहरुख़।
शाहरुख़ को डॉन जैसी फिल्में भाती हैं। शायद यही शौक़ उन्हें रईस की ओर खींच लाया होगा। उन्हें कहानी के जो मुख्य बिंदु बताये गए होंगे, उनमें प्रमुख होंगे- आप एक ईमानदार तस्कर हैं, जो हिंदुओं और मुसलमानों दोनों का साथ देता है, जो मानवता का पक्षधर है, जो अपने कर्म (धंधे) को मानता है वगैराह- वगैराह। कास्टिंग के टाइम उन्हें बताया गया होगा कि नवाज़ भाई हैं पर रोल उनका काफ़ी कम है। बस, यहीं अपने मियां मात खा गए।
रईस बने शाहरुख़ के हाथों खून होते और पुलिस बने नवाज़ुद्दीन को उसके पीछे पड़े देखकर एक बारगी तो ये आभास होने लगा था कि हीरो शाहरुख़ नहीं, नवाज़ हैं। वो तो भला हो स्क्रिप्ट का, कि नवाज़ का ट्रांसफर हो गया और भाईजान को मौका मिल गया कुछ कर दिखाने का। पर क्या कर दिखाने का? एक सीन में वो गरीबों को न्याय दिलाने के लिए भिड़ते हुए दिखाई देते हैं, उसी सीन में पीछे अमिताभ की एक हिट फिल्म का दृश्य चल रहा होता है जिसमें अमिताभ गरीबों को न्याय दिलाने के लिए भिड़े होते हैं। इसका क्या अर्थ हुआ? इस सीन की क्या ज़रूरत थी। इस स्टेज़ पर आकर शाहरुख़ को खुले- आम कॉपी करता दिखाया जाना क्या सिद्ध करता है? यदि रईस के काल को दिखाने के लिए अमिताभ का सीन लिया गया था तो तरस आता है इस सोच पर।
और तरस तो मुझे तब भी आया था जब 9 बजे रात के शो की टिकट देने के लिए मना कर दिया गया क्योंकि सिर्फ तीन ही दर्शक थे। और मज़े की बात ये कि 9.15 की 'क़ाबिल' के लिए 'हाँ' थी क्योंकि वहां ज़्यादा दर्शक थे इसलिये शो चलना था। वो तो जब मैंने हंगामा किया कि हमारी बात कराओ, कैसे नहीं चलेगा शो, एस. आर.के. को पता चलेगा कि क़ाबिल चल रही है और रईस नहीं, तो कितना बुरा लगेगा उसे। तब जाकर उसने कहीं फ़ोन लगाया और हमें टिकट इस शर्त के साथ दिए कि कूपन भी लो, कॉफी और पॉपकॉर्न के, कि कुछ खाओगे- पीओगे भी।
मैंने 500 का नया नोट उसे देते हुए कहा- इतने रईस तो हैं हम भी।😊

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