बुधवार, 16 सितंबर 2026

मेज़ मंथन


 


जी.पी. सिंह यानी घूस प्रसाद सिंह दफ़्तर जाने लगे तो पत्नी ने आवाज़ देकर कहा, ‘‘अजी सुनते हो। मुन्ने, को भी ले जाओ, छुट्टियां है उसकी, घर में बहुत तंग करता है।’’

‘‘यह क्या करेगा वहाँ?’’

‘‘अजी, वही बैंच पर बिठा देना, देखता रहेगा आसपास का नज़ारा’’ पत्नी ने कहा।

‘‘दफ़्तर है, पार्क नहीं, जहाँ बैंच पर बैठ कर यह आसपास का नज़ारा देखेगा?’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानती। चुपचाप ले जाओ, वरना....’’

जी. पी. सिंह ने तुरन्त मुन्ने का हाथ पकड़ा और बाहर निकल लिए। स्वभाव से शान्तिप्रिय जी. पी. सिंह झगड़ा टालने की हर संभव कोशिशों में लगे रहते हैं

दफ़्तर पहुँचे तो घूस प्रसाद सिंह से मिलने वालों की एक लम्बी लाइन लगी थी। उन्होंने अपने पुत्र को एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बिठा दिया और स्वयं अपनी सीट पर जाकर काम करने लगे।

इधर मुन्ना कभी फाइलों को देखता तो कभी आने-जाने वालों को। फिर काफी देर तक अपने बाप को ही निहारता रहा। बाप ने उसकी ओर देखा तो चपड़ासी को बुलाकर पानी भिजवा दिया। मुन्ने ने पानी पीकर, गिलास चपड़ासी के हाथ में दिया और बाप के पास चला आया।

बाप के पास आकर वह कान में धीरे से फुसफुसाया, ‘‘पापा, आप बार-बार मेज के नीचे हाथ क्यों डाल रहे हैं?’’

उस समय उसके सामने एक पार्टीबैठी थी। अतः घूस प्रसाद ने अपने पुत्र का कान पकड़ा और मुँह के आगे हाथ रखकर धीरे से फुसफुसाया, ‘‘अभी चुपचाप जाकर बैठो, बाद में बतलाऊंगा।’’

बच्चा समझदार था। जानता था कि ऐसे समय में मुँह बंद रखना चाहिए, अतः चुपचाप जाकर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद लंच हुआ। घूस प्रसाद ने पत्नी का दिया लंच बाक्स खोला तो बेटे ने मुँह खोल दिया-

‘‘पापा, आप मेज के नीचे हाथ क्यों डाल रहे थे?’’

‘‘तुम्हारे लिए रंगीन टी.वी. निकाल रहा था।’’ घूस प्रसाद ने इत्मीनान से बतलाया।

‘‘मेज के नीचे से?’’ बच्चा चौंका

‘‘हाँ, बेटे!’’

‘‘मेज के नीचे टी.वी. होता है?’’

‘‘हाँ, और फ्रिज भी!’’

‘‘फ्रिज भी?’’

‘‘पिछले साल लाया था न, यहीं से निकाला था।’’

‘‘मेज के नीचे से?’’

‘‘हाँ, उससे पहले टेपरिकार्डर भी यहीं से निकाला था।’’

‘‘मेज के नीचे से?’’

‘‘हाँ’’

‘‘और क्या-क्या निकलता है, मेज के नीचे से?’’ बच्चे में कौतूहल जगा।

‘‘तुम्हारा एडमीशन, पब्लिक स्कूल में। तुम्हारी मम्मी की साड़ियां, तुम सबका मसूरी-ट्रिप।

‘‘और?’’

‘‘बाकी बातें बाद में, पहले लंच कर लो।’’

लंच के बाद घूस प्रसाद सिंह ने पुत्र को चपड़ासी के साथ घर भेज दिया। वह नहीं चाहते थे कि मेज की पोल और अधिक खोली जाए। वह चाहते थे कि बच्चा मेज के नीचे का चक्करभूल जाए।

लेकिन बच्चा भूला नहीं। शाम को वह अपने दोस्त से मिला।

‘‘यार, तुझे मालूम है मेज के नीच क्या-क्या होता है?’’ उसने दोस्त से पूछा। उसे यकीन था कि दोस्त को नहीं मालूम होगा।

‘‘क्या-क्या होता है?’’ दोस्त ने पूछा।

‘‘मेज के नीचे होता है टी.वी., मेज के नीचे होता है, फ्रिज, मेज के नीचे होता है टेपरिकार्डर ओर मेरा एडमीशन।’’

 ‘’और?’’

‘‘और मम्मी की साड़ियां और हमारा मसूरी-ट्रिप।’’

‘‘और?’’ दोस्त ने पूछा।

‘‘और? और क्या?’’

‘‘मेज के नीचे होती है पापा की कार, मेज के नीचे होती है मेरी दीदी की शादी, भइया का अमरीका में एडमीशन और हमारा मकान।’’ दोस्त बोला।

‘‘तुम्हें किसने बतलाया?’’ घूस प्रसाद के पुत्र ने चौंकते हुए पूछा।

‘‘मेरे पापा ने।’’

‘‘कब?’’

‘‘जब मैं एक दिन उनके साथ दफ्तर गया था, तब।’’ दोस्त ने जबाव दिया।

 

सोमवार, 14 सितंबर 2026

अमित सर की हिंदी


केबीसी यानी कौन बनेगा करोड़पति पिछले दो - ढाई दशकों से चल रहा है। मैंने शुरू के कुछ एपिसोड्स देखे थे, फिर अमिताभ द्वारा प्रतियोगियों से सवाल पूछने की यह शैली कि "इतने रुपये पहले तो कभी देखे नहीं होंगे आपने" सुनकर मुझे बुरा लगता था  और मैंने यह कार्यक्रम देखना छोड़ दिया। अब जाकर इस साल मैंने इसे दोबारा देखना शुरू किया तो मुझे कुछ नए अनुभव हुए।

कार्यक्रम सवालों और उनके जवाबों पर केंद्रित है। लेकिन सिर्फ़ सवालों और जवाबों से दर्शक वर्ग इस कार्यक्रम को देखने के लिए इससे जुड़ा रहेगा, इस बात पर शायद इसके आयोजकों को भी यकीन नहीं था। इसलिए इसमें फीलिंग्स यानी संवेदनाओं का तड़का लगाया गया। मैं जब इस कार्यक्रम को देख रहा हूँ तो इसे तड़के के साथ ही देख रहा हूँ। कार्यक्रम में अधिकांश प्रतिभागी कमज़ोर आर्थिक स्थिति से आते हैं। उन सबकी एक स्टोरी होती है जिसे सुनकर मन द्रवित हो जाता है। हालांकि कभी-कभी मन में यह विचार भी आता है कि कहीं दर्शकों को भिगोना भी आयोजकों का एक लक्ष्य तो नहीं? लेकिन लक्ष्य हो भी तो क्या कहिएगा! कार्यक्रम में सवाल -जवाब हैं, पुरस्कार हैं, धन है, अलग अलग प्रतिभागियों की अलग-अलग कहानियां हैं, संवेदनाएं हैं, अब बीच बीच में परिस्थितियों से जुड़े फिल्मी गीत भी डाले जा रहे हैं और सबसे बड़ी बात कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन हैं, उनकी हिंदी है, उनके द्वारा बारम्बार बोली जा रहीं बधाई और शुभकामनाएं हैं।

मैंने अपने बेटे से कहा कि अनेक वर्षों बाद देख रहा हूँ इस कार्यक्रम को। जब शुरू में देखता था तो इसमें प्रतिभागी के तौर पर जाने का मन करता था। अब सोचता हूँ क्या फिर से प्रयास करूँ?

"कोई फ़ायदा नहीं, पापा। आपकी कहानी ऐसी नहीं कि वे लोग आपका चुनाव कर लें अपने प्रोग्राम के लिए और आपको बुला लें। आप तो अमिताभ सर को ऐसे ही घर बैठे देखते रहें और उनकी प्यारी हिंदी सुनकर मस्त रहें।" उसने उत्तर दिया।

"कैसे मस्त रहा जाए! आपके अमिताभ सर तो हर बात पर प्रतिभागी को बधाई दे देते हैं। बधाई और शुभकामनाओं में अंतर होता है। हिंदी दिवस पर उन्हें इस अंतर को पहचानना होगा।" -  मैं कहना चाहता हूँ पर अंततः चुप्पी लगा जाता हूँ।


रविवार, 12 मई 2019

कविता मातृ दिवस पर/ जिनकी माँ नहीं होती।

कविता (मातृ दिवस पर)
*जिनकी माँ नहीं होती*

जिन बच्चों की माँ नहीं होती
बाप ज़िम्मेदारी निभाते हैं माँ की भी
जिस तरह भगवान में आस्था होने पर
लोग पत्थर को भगवान मान लेते हैं
बच्चे भी ढूंढ लेते हैं बाप की आंखों में माँ का अक्स
पत्थर नहीं होता बाप
सिर्फ कलेजा पत्थर का रखता है
पार कराने होते हैं उसे बच्चे
भवसागर के पार

जिनकी नहीं होतीं माँ
उनकी जिम्मेदारी कहीं ज़्यादा बढ़ जाती है जीवन में
वो बहाने नहीं बना सकते माँ के लाड़ में बिगड़ जाने का
वो अपने कदमों को नियंत्रित रखते हैं
और करमों को दुरुस्त
वो प्यार की कीमत ज़्यादा जानते हैं उन बच्चों से
जिनकी माँ होती हैं

जब गली में खड़े वे बच्चे 
जिनकी माँ होती हैं
सड़क पार कराने के लिए माँ को आवाज़ लगा रहे होते हैं
वे बिना ऊँगली पकड़े भी पार कर जाते हैं ज़िन्दगी के बड़े-बड़े चौराहे
जिनकी माँ नहीं होती

माँ होनी चाहिए सभी की 
पर नहीं होती
तो इसके लिए ये बच्चे भगवान पर नहीं बिगड़ते
और न ही दोष देते हैं मुक़द्दर को 
दूसरे बच्चों की माँ को देखकर
सर्वाधिक नेह उनकी आंखों से ही टपकता है
जिनकी अपनी माँ नहीं होती

जो सौन्दर्य माँ की आंखों में होता है
वो सारा का सारा उन बच्चों की आंखों में अंतरित हो जाता है
जिन बच्चों की माँ नहीं होती

जिन बच्चों की माँ नहीं होती
उन्हें कभी घबराने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती है
उनके मस्तक पर धरती माँ का तिलक लगा होता है
मुसीबत उन पर आने से डरती है

तो बच्चों, कभी मिलो ऐसे बच्चों से 
जिनकी माँ नहीं होती
तो सम्मान के साथ मिलना
क्योंकि माँ किसी एक की नहीं होती
वो चली जाती है उनके पास
जिन्हें उनकी ज़्यादा ज़रूरत होती है

बिन माँ का होना
अधूरापन नहीं
सिम्बल है सम्पूर्णता का 
परिचायक है परिपक्वता का 
क्योंकि माँ भीतर होती है
बच्चे के।
   *जितेन्द्र 'जीतू'












शनिवार, 10 नवंबर 2018

फ़िल्म समीक्षा/ठग्स ऑफ हिंदुस्तान


             ठगों का नाम सुनकर कभी किसी काल में, बरसों पूर्व, पसीने निकल जाते होंगे। लेकिन निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य की "ठग्स ऑफ इंडिया" देखने पर पैसे निकले, पसीने नहीं। पौने तीन घंटे की इस फ़िल्म में अमिताभ हैं, आमिर हैं, कैटरीना है और फातिमा सना शेख है। इसमें आमिर का चुलबुला स्टाइल है और अमिताभ की धीर गंभीर अभिनय शैली है।

              फ़िल्म के शुरू में क्लाइव का नाम सुनते ही लगता है कि यह कहीं  रोबर्ट क्लाइव तो नहीं। लेकिन नहीं। वह क्लाइव तो 1774 को ही दिवंगत हो चुके थे जबकि फ़िल्म में 1795 की कहानी कही गयी है और यहां जॉन क्लाइव है। पूरी फिल्म में अंग्रेजों को ठगों से मात खाते दिखाया गया है। यह दो बड़े नायकों आमिर-अमिताभ की संयुक्त रूप से पहली फ़िल्म है तो ऐसा होना भी चाहिए था। दोनों ठग बने हैं लेकिन एक अंतर है। आमिर के चरित्र में कुछ विविधता है जबकि अमिताभ का वही पुराना एंग्री मैन का रूप भुनाया गया है। आमिर का गधे के ऊपर बैठकर संवाद अदायगी करना मुल्ला नसरुद्दीन नाम के बहुत पुराने चरित्र का स्मरण कराता है। 

               फ़िल्म का नाम ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान है लेकिन अमिताभ किस लिहाज़ से ठग हैं यह शोध का विषय है। अंग्रेजों के पानी के जहाज़ पर रूप बदलकर हमला करना और उन्हें लूटना बड़े ठग का काम है जबकि छोटे ठग यानी आमिर का काम काफिले के भीतर सेंध लगाकर उनका विश्वास जीतना, फिर लुटेरों को उनकी सूचना देकर लुटवाना और फिर अंग्रेजों को लुटेरों की सूचना देकर इनाम हासिल करना है। जिस तरह वे चरित्र बदलते हैं, ठग ऑफ हिन्दोस्तान ही लगते हैं।

                 इतिहास से प्रेरित स्टोरी (इतिहास नहीं) वाली इस फ़िल्म में नाच गाने के लिए रखी गई कैटरीना (सुरैया) का रोल उतना ही है जितना कि अमिताभ की फिल्मों में होता था। उनके डांस स्टेप्स 1795 के हैं, यह भी शोध का विषय है। रोनित रॉय (मिर्ज़ा सिकंदर बेग ) की जीवित बेटी और दंगल फेम फातिमा (ज़फीरा) को अमिताभ (खुदाबक्श आज़ाद) युद्ध से बचा लाते हैं। वह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में अमिताभ की सहयोगी बनी है और बिना एक्सप्रेशंस वाले सीन्स करती नज़र आती है। वस्तुतः यही किरदार फ़िल्म का बेसिक क़िरदार है। फ़िल्म की कहानी इसी किरदार को लेकर शुरू हुई थी और इसी किरदार पर खत्म होती है। बीच में बहुत कुछ है जो इस फ़िल्म को हिट कराने के लिए ज़रूरी है।

                    आंखों से अभिनय करनेवाले अमिताभ का मध्यांतर से पूर्व हटना, उनके रोल को कम करना अखरता है। इस अवधि में आमिर (फिरंगी मल्लाह) को कहानी बढ़ाने का अवसर मिलता है। लोएड  ओवन के रूप में जॉन क्लाइव जमे हैं। आमिर के दोस्त के रूप में जीशान अय्यूब (शनि) की भूमिका फाड़ू है। ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान दो पीढ़ियों के दिग्गजों के अभिनय कौशल का इम्तिहान है। इस इम्तेहान में डायरेक्टर बाद वाली पीढ़ी के साथ खड़ा दिखाई देता है। आमिर की फिल्मों की धन कमाऊ क्षमता और लोकप्रियता और अमिताभ के पक्ष में सिर्फ लोकप्रियता के चलते यह ज़रूरी लगा होगा। 

                     आजकल फिल्मों के गीतों के अधिकार पहले ही बिक जाते हैं और इससे बजट का अधिकांश हिस्सा कवर करने में मदद मिलती है। साढ़े तीन सौ करोड़ के इस सौदे में से गीत-संगीत बेचने से प्राप्त कमाई को हटाने पर जो कुछ बचता है उसे ये दोनों दिग्गज आसानी से पब्लिक से प्राप्त कर लेंगे, इसमें संदेह नहीं। आखिर दो हज़ार स्क्रीन्स के यूनिवर्सल और 5 हज़ार स्क्रीन्स के देसी राइट्स यों ही बरबाद थोड़े जाएंगे। ऐसे में अमिताभ बच्चन का आमिर खान को 1000 करोड़ कमाने का आशीर्वचन कितना प्रभावी सिद्ध हो पाता है, यह तो वक़्त ही बताएगा। 

                       कैमरे ने कमाल किया है। फाइटिंग के दृश्य फ़िल्म को फाइट में रखते हैं। गीत के बोल मौके के हैं पर तभी तक याद रहते हैं जब तक देख रहे होते हैं। संगीत पर मेहनत के साथ पॉपुलैरिटी पक्ष पर भी ध्यान दिया गया होता तो देखकर बाहर निकलने वाले दर्शक कुछ गुनगुना भी रहे होते। अमिताभ-आमिर के मध्य डायलागबाज़ी व फाइट सीन्स और आमिर के कॉमिक सीन्स पिक्चर की यू एस पी हैं।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

महिलाओं पर राष्ट्रीय सहमति

महिलायें लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे सुन्दर वस्तु हैं इसलिये इन पर राष्ट्रीय सहमति बनानी अत्यन्त आवश्यक है। एक बार राष्ट्रीय सहमति का ठप्पा लग गया तो फिर महिलाओं के साथ कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है और कोई भी जीवित व्यक्ति/पार्टी विरोध कारगर नहीं होगा।
यूँ महिलाओं के लिये महिलाओं के विरूद्ध अभी भी काफी कुछ पुरूषों द्वारा किया जा रहा है। मसलन, वर्ष में एक दिन महिला-दिवस के रूप में मनाया जाता है उस दिन जहाँ सरकारी और संस्थागत तौर पर कई कार्यक्रम सम्पन्न होते हैं वहीं ठोक उसी दिन गैर सरकारी और व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं का मानमर्दन/क्रियाक्रम सम्पन्न किया जाता है और इस धार्मिक अनुष्ठान में निर्धन और सम्पन्न दोनों प्रकार के पुरूष बराबरी से हिस्सा लेते हैं।
साहित्य जगत में महिलाओं पर काफी कुछ लिखा गया है और वर्तमान में भी कई जागरूक सम्पादक, महिलाओं पर अपनी-अपनी पत्रिकाओं के विशेषांक निकाल रहे है जो पूरी/अपूरी तरह महिलाओं की निजी समस्याओं और कभी-कभी निजी अंगों पर केन्द्रित होते हैं। इन पत्रिकाओं में लेखिकाओं के लेख भी छपते हैं जिनकी कोशिश यह रहती है कि औरतों की ज्यादा से ज्यादा समस्यायें पाठकों के समक्ष रखी जायें किन्तु उनका निदान पाठकों पर और राष्ट्र पर छोड़ दिया जाये।
मैं चूंकि महिलाओं पर राष्ट्रीय सहमति बनाने के इस भव्य आयोजन में संयोजक का गैर ज़िम्मेदाराना कर्तव्य निभा रहा हूँ इसलिये सबसे पहले मेरा यह दायित्व बनता है कि मैं अपने मान्य विचार आप लोगों के समक्ष रखूँ।
‘साथियों, चूँकि इस लेख को पढ़ने और पढ़कर समझने वाले ज़्यादातर मित्र पुरूष ही हैं और प्रत्येक के घर में एक ना एक अबला स्त्री होती है अतः क्यों न इस राष्ट्रीय सहमति की शुरूआत घर से ही की जाये। घर में पायी जाने वाली महिला चाहे वह बीवी हो, माँ हो या बहिन, उसे इस बात की कड़ी हिदायत दे देनी चाहिये कि वह वस्त्रों में क्या पहिने और क्या न पहिने। तकनीकी शब्दावली में उस पर ‘ड्रेस कोड’ तत्काल प्रभाव से लागू कर देना चाहिये। पति लोग अपनी पत्नी को साड़ी न बांधने के निर्देश दे सकते है क्योंकि साड़ी एक यौ नोत्तेजक पोशाक है जिसे बांधकर शरीर के मध्य भाग की नुमाइश होती है। अतः सलवाज कमीज पहनें। कमीज का डिजाइन और उसकी कटिंग पति द्वारा अभिप्रमाणित हो। कड़ाई पेट से ऊपर न हो और गला, ज्यादा नीचा न हो। आस्तीन कुहनी से ऊपर बिल्कुल न जाने पाये क्योंकि इससे मित्रों से खतरा रहता है और पत्नी निज़ी नहीं रहने पाती।
युवा अपनी बहिनों को और वृद्ध अपनी बेटियों को जींस न पहिनने दें। जींस एक पाश्चात्य पोशाक है और यह दूसरे को बहिन-बेटियों पर ही फबती है अपनी पर नहीं।
तेजी से बढ़ता बच्चा लोग यह खेल अपनी-अपनी माँओं पर खेल सकते हैं। वे क्या पहिन-ओढ़ रही हैं इस पर गहरी नज़र रखें। बाप से चुगली करें और माँ को मनपसंद कपड़े पहिनने से रोकें। किन्तु तारिकाओं के ग्लैमरस् पोस्टर्स इकट्ठें करें और फिल्में खूब देखें।
किसी भी मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति के लिये आमजनों का सहयोग परम् आवश्यक है और अभी तक आमजनों में महिलायें भी आती रही हैं। अतः महिलाओं के सहयोग के बिना महिलाओं पर राष्ट्रीय सहमति बनानी मुश्किल प्रतीत होती है। देश की कामकाजी महिलायें इस दिशा में अपने-अपने पतियों को अपनी-अपनी पसंद के ठोस सुझाव और दिशा-निर्देश दे सकती हैं। उन्हें चाहिये कि वे अपने पतियों के घर के बाहर उठने-बैठने-सोने में एतराज़ बिल्कुल न करें। घरेलू महिलाओं का दृष्टिकोण इस मामले में संकुचित हो सकता है किन्तु कामकाजी महिलाओं का सहृदयता दिखलानी चाहिये। पति को घर पर आने वाली कामवाली पसंद हो तो घर का मामला घर में ही निबटा लेना चाहिये।
राष्ट्रीय सहमति पर मैं जो यह अपनी बात कह रहा हूँ उसे कोरा भाषण मात्र ही न समझा जाये। महिलाओं पर राष्ट्रीय सहमति के व्यापक अर्थ हैं जिनमें प्रमुख हैं, महिलाओं की इज्ज़त उछालने पर राष्ट्रीय सहमति, महिलाओं की आबरू पर राष्ट्रीय सहमति, महिलाओं के चीरहरण पर राष्ट्रीय सहमति आदि-आदि। प्रबुद्ध और योग्य व्यक्ति इनमें अश्लील निहितार्थ भी निकाल सकते हैं। उनका स्वागत है। किन्तु एक बात तो तय है। एक बार समूचा राष्ट्र महिलाओं पर सहमत हो जाये तो फिर उनकी इज्ज़त भरे बाजार में उछालने अथवा पति परमेश्वर द्वारा सरेआम चप्पलों से इनके साथ प्रेम प्रदर्शन करने से कोई नहीं रोक सकता। खुद कोई महिला भी नहीं।’

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

शाहरुख़ नहीं, रईस !!

रईस में शाहरुख़ नहीं, शाहरुख़ में रईस हैं। और ये कारनामा करने वाले खुद शाहरुख़ हैं। इस लिहाज से उनका ये बोल्ड स्टेप है। वही बोल्ड स्टेप जो उन्होंने बाज़ीगर में तब लिया था जब वो एस्टेब्लिश्ड नहीं थे और उनके सामने फिल्म में नवाज़ुद्दीन भी नहीं थे, जिन्होंने आधे से ज़्यादा फिल्म में रईस को दबाये रखा। शाहरुख़ तो खुद फिल्म ख़त्म होने से करीब आधे घंटे पहले तक रईस से दबे हुए थे।
ये फिल्म क़ायदे से शाहरुख़ की थी भी नहीं। फायदे की भी नहीं थी। जो लोग फिल्म में शाहरुख़ को देखने गए, उन्हें रईस मिला तपाक से और जो रईस को देखने गए, उन्हें न तो पूरा रईस ही मिला और न ही पूरा शाहरुख़।
शाहरुख़ को डॉन जैसी फिल्में भाती हैं। शायद यही शौक़ उन्हें रईस की ओर खींच लाया होगा। उन्हें कहानी के जो मुख्य बिंदु बताये गए होंगे, उनमें प्रमुख होंगे- आप एक ईमानदार तस्कर हैं, जो हिंदुओं और मुसलमानों दोनों का साथ देता है, जो मानवता का पक्षधर है, जो अपने कर्म (धंधे) को मानता है वगैराह- वगैराह। कास्टिंग के टाइम उन्हें बताया गया होगा कि नवाज़ भाई हैं पर रोल उनका काफ़ी कम है। बस, यहीं अपने मियां मात खा गए।
रईस बने शाहरुख़ के हाथों खून होते और पुलिस बने नवाज़ुद्दीन को उसके पीछे पड़े देखकर एक बारगी तो ये आभास होने लगा था कि हीरो शाहरुख़ नहीं, नवाज़ हैं। वो तो भला हो स्क्रिप्ट का, कि नवाज़ का ट्रांसफर हो गया और भाईजान को मौका मिल गया कुछ कर दिखाने का। पर क्या कर दिखाने का? एक सीन में वो गरीबों को न्याय दिलाने के लिए भिड़ते हुए दिखाई देते हैं, उसी सीन में पीछे अमिताभ की एक हिट फिल्म का दृश्य चल रहा होता है जिसमें अमिताभ गरीबों को न्याय दिलाने के लिए भिड़े होते हैं। इसका क्या अर्थ हुआ? इस सीन की क्या ज़रूरत थी। इस स्टेज़ पर आकर शाहरुख़ को खुले- आम कॉपी करता दिखाया जाना क्या सिद्ध करता है? यदि रईस के काल को दिखाने के लिए अमिताभ का सीन लिया गया था तो तरस आता है इस सोच पर।
और तरस तो मुझे तब भी आया था जब 9 बजे रात के शो की टिकट देने के लिए मना कर दिया गया क्योंकि सिर्फ तीन ही दर्शक थे। और मज़े की बात ये कि 9.15 की 'क़ाबिल' के लिए 'हाँ' थी क्योंकि वहां ज़्यादा दर्शक थे इसलिये शो चलना था। वो तो जब मैंने हंगामा किया कि हमारी बात कराओ, कैसे नहीं चलेगा शो, एस. आर.के. को पता चलेगा कि क़ाबिल चल रही है और रईस नहीं, तो कितना बुरा लगेगा उसे। तब जाकर उसने कहीं फ़ोन लगाया और हमें टिकट इस शर्त के साथ दिए कि कूपन भी लो, कॉफी और पॉपकॉर्न के, कि कुछ खाओगे- पीओगे भी।
मैंने 500 का नया नोट उसे देते हुए कहा- इतने रईस तो हैं हम भी।😊

रविवार, 22 जनवरी 2017

तक़दीर का फंसाना

          छोटे शहर में ऑटो कम, रिक्शाएं ज्यादा होती हैं। रिक्शा चलाने वाले को रिक्शावाला कहा जाता है। रिक्शावाला बचपन से रिक्शावाला नहीं होता। बचपन में वो रिक्शावाले का लड़का होता है। वो अपने बाप से छुपकर रिक्शा पर अपना हाथ साफ़ करता है। तब, जब उसका बाप दोपहर में घर आया हुआ होता है और आराम कर रहा होता है। माँ चिल्लाती है कि पढ़ लिख ले वरना बाप की तरह रिक्शा ही चलाता रह जायेगा। बाप भी उसे पीटता है रिक्शा दीवार में ठुक जाने पर। बाद में जब उसका बाप दारु पीकर कई - कई दिन काम पर नहीं जाता तो उसकी माँ ही उसे कहती है कि जा, रिक्शा ले जा और कुछ कमा कर ला। ये भड़ुआ तो घर पर ही पड़ा रहेगा। कालांतर में यही लड़का अमिताभ बच्चन की तरह मर्द बनता है और रिक्शावाला कहलाता है।

            वो छोटा सा मर्द अपने छोटे से शहर में अपना बड़ा सा रिक्शा संभाल लेता है। रिक्शा सँभालने के बाद ही उसे पता चलता है कि जिस रिक्शा को वो अपनी समझ रहा था वो तो किराये की है। जल्दी ही उसे ये भी ज्ञात हो जाता है कि रिक्शा का किराया भी कई महीनो से उसके मालिक को नहीं दिया गया। वो हड़बड़ा जाता है। बाप से वो कुछ कह नहीं पाता क्योंकि बाप जो होता है वो बाप होता है। वो दारु पीकर पड़ा हो तो भी बाप ही होता है।

              रिक्शा की पैडल मारते - मारते ही वो यह भी जान जाता है कि उसका बाप भरी जवानी में क्यों खांसने लगा था और वक़्त से पहले बूढा क्यों हो गया था । अब उसे यह जानने में दिलचस्पी थी कि उसका बाप घर पर कम पैसे क्यों लाता था। दो - चार पुलिसवालों के अपनत्व से उसे जल्दी ही इस बात की तसल्ली मिल जाती है कि उसकी रिक्शा पर सवारियों का टोटा नहीं रहने वाला। बस, अब उसे किराया चुकाने वाली सवारियों की तलाश थी। 

             तीन साल हो गए थे उसे रिक्शा चलाते। अभी उसकी शादी नहीं हो सकी थी। उसे हैरानी थी कि उसके बाप की उसकी उम्र में शादी कैसे हो गयी थी। जिस हिसाब से वो कमा रहा थाउसे नहीं लगता था कि आगामी तीस सालों में भी उसकी शादी होने की संभावना बनती थी। कमा क्या रहा था, गँवा ज्यादा रहा था।  पैसा, सेहत और उम्र। पैसा उसपर भारी था और सेहत पैसों पर। दोनों मिलकर उसकी उम्र पर भारी पड़ रहे थे। 

               गलती से एक बार उसकी शादी हो गयी। कोई नहीं रोक सका उसकी शादी को। भगवान की यही मर्ज़ी थी। रिश्ता भी तो भगवानदास ने ही कराया था। लड़की की माँ उसे कहीं मिल गयी थी। वो अपनी लड़की के लिए परेशान थी। इधर इसकी माँ भी परेशान थी। दोनों ने सोचा कि जब परेशान ही होना है तो साथ मिलकर परेशान क्यों न हों। फिर दोनों मिलकर भगवान को परेशान करेंगे। भगवानदास से उनकी दुश्मनी जानी जाती थी। 

              वो बहुत खुश था। वहीजो पहले रिक्शावाले का लड़का कहलाता था और बाद में खुद रिक्शावाला कहलाने लगा था। उसकी शादी एक मंदिर में हुई जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो शामिल हुए थे। लड़की की माँ और उसका रिक्शावाला बाप भी था। ख़ुशी की बात यह कि वो लड़की भी थी जिससे उसकी शादी तय हुई थी। लड़की के बाप ने उसे एक कोने में ले जाकर उसके हाथ में लिवर दुरुस्त रखने की एक शीशी थमाई और दूसरे हाथ से उसकी जेब में बियर की एक छोटी सी बोतल चुपके से ये कहते हुए डाल दी कि रिक्शा खींचने से लिवर और किडनी पर असर पड़ता है और ये दोनों दवाइयां नियमित रूप से लेने से उनपर असर काम पड़ेगा। 

                रिक्शावाले लड़के को रात बिताने के लिए वही खोली नसीब हुई जो उसके बाप रिक्शावाले को और उसके भी पहले उसके पिता को बरसों पहले नसीब हुई थी और जहाँ वो माँ के साथ रहता आया था। माँ ने खुश होकर अपनी चारपाई भी नए जोड़े के हवाले कर दी थी और खुद वो बाहर अपने शराबी पति के साथ रात काटने के लिए इस शर्त पर चली गयी थी कि वो उस रात शराब नहीं पियेगा। ख़सम ने भी शर्त की लाज़ रखी और उस रात शराब न पीकर वो बियर पी जो उसे उसके पुत्र की जेब से थोड़ी देर पहले हासिल हुई थी। 

                  उस रात अपने रिक्शावाले भइया ने अपनी नयी नवेली का घूंघट उठाया तो नवेली ने मुँह दिखाई में माँगा कि अगर लड़का हुआ तो एक अच्छी सी रिक्शा दिलाएगा और लड़की हुई तो एक अच्छे से रिक्शावाले के साथ उसका ब्याह रचाएगा। 

                    और अपने भइया ने मुस्कुराकर हाँ कर दी।