एक ज़माना था जब मेरे शहर में कारों की संख्या ना के बराबर थीं। उन दिनों मेरे एक परिचित जब मेरे शहर में आए थे तो बड़ी ही हिकारत से कहा था कि कैसा शहर है तुम्हारा। पूरे दिन में एक भी कार देखने को नहीं मिली। मुझे अच्छी तरह से याद है कि इस रहस्योद्घाटन से मैं बहुत लज्जित हुआ था।
आपको यह अवगत कराते हुए मैं प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ कि आज मेरा दुख दूर हो गया है। बेशक इसमें पच्चीस से तीस साल लग गए पर मैं गर्व से कह सकता हूँ कि आज मेरा शहर कारों के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है। अब जहां भी देखिए, वहीं पर कारें ही कारें नज़र आती हैं। मम्मी - पापा की कार, भैया - भाभी की कार, दादा - दादी की कार और मेरी कार। किसी घर में अब कारें अपनी मेक से कम, स्वामित्व से ज्यादा जानी जाती हैं।
पिछले कुछ समय में मेरे शहर में अगर किसी प्रकार की कोई क्रांति आयी है तो निसंकोच कहूँ, वह कार - क्रांति है। मुझे लगता है यह क्रांति भी पैदल नहीं, किसी कार में ही आयी है। आप कहीं भी चले जाएं आपको कारें ही कारें दिखाई देंगी। चूंकि पार्किंग सब जगह नहीं है तो आप स्कूल जाएं या फिर डॉक्टर के पास, कोई आपको कार लगाता मिलेगा तो कोई हटाता मिलेगा। आप सड़क किनारे एक पान खाने भी खड़े होंगे तो चार कार वाले आपको अपनी कार बैक करते हुए दिखाई देंगे। खोमचे वाले के पास खड़े चाउमीन खाते समय आप देखेंगे कि पांच कार वाले आसपास अपनी कार लगाने के लिए जगह ढूंढ रहे होंगे।
स्थिति तब रोचक हो जाती है जब नई बस्ती से मेन रोड पर आने के लिए आपको एक घंटा लग जाता है क्योंकि तीन कारें आपकी कार के आगे होगीं और चार कारें पीछे। अब आप जाएं तो जाएं कहां! गली में किसी को अपनी कार अपने घर में लेकर जानी होगी तो आपका रास्ता रुकेगा या किसी को अपनी कार अपने घर से बाहर लानी होगी तो आपका रास्ता रुकेगा। फिर, फड़ वाले हैं, दुकान वाले हैं, रिक्शा वाले हैं, ऑटो वाले हैं, बाइक वाले है, स्कूटी वाले हैं, पैदल चलने वाले हैं, एक ही वक़्त में इन सबसे पार पाने में, एक उम्र निकल जाएगी गली से बाहर आने में।
अब एक बार बाहर आने के बाद ऐसा तो नहीं कि आप दोबारा गली में नहीं जाएंगे? जब आपका काम हो जाएगा तो गली फिर आपको वापस बुलाएगी। आप जाएंगे। और इसके लिए फिर आपको वही उपक्रम दोहराना होगा जो आपने गली से बाहर आते समय किया था। तब आपके मुँह से गाली निकलेगी, गली नहीं।
निसंदेह, शहर में कारों की संख्या जिस चाल से बढ़ी हैं उस चाल से बेचारा विकास नहीं बढ़ा। वो अब भी वैसा का वैसा ही है। शहर अब भी वही है। वही छोटी - छोटी गलियां, वही छोटी - छोटी सड़कें पर कारें बड़ी - बड़ी आ गई हैं। काम ख़त्म हो जाने पर अपनी कार को अगर कोई दुकान से हटाने के लिए बैक करता है तो यह देखकर रूह कांप जाती है कि पीछे सड़क पर सारा ट्रैफिक जाम हो जाता है। और "ख़ुदा न खास्ता" कार को बैक करने वाला कोई नौसिखिया हुआ तो सड़क पर अन्य कारों की मीलों लंबी लाइन लगने से देवता भी नहीं रोक सकते।
मज़ा तो तब आता है जब छोटे शहरों का ट्रैफिक वन वे कर दिया जाता है। यकीन मानिए, तब सड़क पर रेंगते ट्रैफिक को देखना एक अलग ही सुखद अनुभव होता है। शहर वही, सड़कें वही, पुरानी वाली लेकिन ट्रीटमेंट नया और आधुनिक। वन वे में सड़क पर मात्र एक कार के चलने का रास्ता है और चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक पुलिस का सिपाही ट्रैफिक नियंत्रित करने के उद्देश्य से एक तरफ़ का ट्रैफिक जब रोकता है तो कारों की लंबी लाइन लग जाती है जो पिछले चौराहे तक होती जा। इस पर मज़ा यह कि जिसे अपनी कार बाएं ले जानी है वह सबसे ज़्यादा रोता दिखता है क्योंकि बाएं जाने का रास्ता ही नहीं होता। उसके आगे बैलबुग्घी खड़ी होती है।
कार चलाने वाले हर उम्र के होते हैं। जब वे बाली उम्र के होते हैं तो उनका पांव कार के एक्सीलरेटर पर से नहीं हटता। उनका हाथ भी हॉर्न पर से नहीं हटता। ऐसा ही एक कारबाज़ मेरी कॉलोनी में रहता है। रात को बारह बजे जब लौटता है तब लोग सोने की तैयारी कर रहे होते हैं। उसकी कार की गति हवा को मात दे रही होती है। हॉर्न की नब्बे डेसिबल की आवाज़ लोगों को चौंकाती और डराती है। कार में तेज़ आवाज़ में बज रहा स्टीरियो चेतावनी देता महसूस होता है कि जागते रहो, सोना मना है।
अभी मैं बे- कार हूँ। जल्दी से यह लेख ख़त्म कर मुझे भी कार खरीदने जाना है। जब मेरे छोटे शहर में इतनी कारें एक के ऊपर एक दौड़ रही हैं तो मैं भी क्यों पीछे रहूं।





