बुधवार, 30 सितंबर 2026

कभी नाली, कभी सड़क...



- 'भाई साहब, आज स्कूटर कहाँ है आपका? पैदल चले आ रहे हैं?" मित्र ने मुझे आते देखा तो हैरानी से पूछा।

- "स्कूटर घर से बाहर निकालने के लिए रास्ता ही नहीं है।" मैंने फूलती सांस को नियंत्रित करते हुए जवाब दिया।

- "क्यों?"

- "क्योंकि बाहर की नाली बनाई जा रही है।"

- "वह तो बन गई थी, आपने फ़ोन पर बताया था।"

- "वह तो घर के एक साइड की नाली थी। अब यह दूसरे साइड की बननी है।"

- "कितने साइड की बननी हैं?"

- "घर के एक तरफ़ की नाली बन गयी, दूसरी तरफ़ की पुरानी नाली आज तोड़ दी गयी है, वहां अब नई नाली बनेगी।"

- "पहली साइड की जहां नाली बन गयी है, वहां से स्कूटर निकाल लीजिए, क्या दिक्कत है?"

- "उधर मैंने अभी रैंप नहीं बनवाया। पुराना रैंप नई नाली बनाने वालों ने तोड़ दिया था।"

- "तो बनवा लीजिये। किसने मना किया।"

- "कैसे बनवाऊं? वे कह रहे हैं अभी सड़क बनेगी, उसके बाद बनवाना।"

- "ओह, तो सड़क क्यों नहीं बनी?"

- 'क्योंकि नई नालियां अभी बन रही हैं। जब तक सभी नालियां नहीं बन जाती तब तक सड़क नहीं बनेगी।"

- "तो आपको स्कूटर बाहर निकाल लेना चाहिए था, दूसरी तरफ़ का रैंप तोड़ने से पहले।"

- "कैसे निकालता? दोपहर में मैं खाना  खा रहा था कि मशीन की आवाज़ आयी, जब तक बाहर पहुंचता उन्होंने रैंप तोड़ दिया था। बाहर आया और यह सब देखता रह गया।"

मित्र चुप हो गए। मैं उनकी तरफ़ से उछाले जाने वाले नए सवाल की बाट जोहने लगा। जब वह कुछ नहीं बोले तो मैंने उन्हें अपने मोबाइल में टूटी नालियों की तस्वीर दिखाई। नालियां टूटने के बाद पानी सड़क पर आ गया था, मेन नाला भी तोड़ दिया गया था।सारा दृश्य गंदा लग रहा था।

- "यहां तो खूब मच्छर आ रहे होंगे?" तस्वीर देखने के बाद मित्र भी सिर पकड़ कर बैठ गए थे। 

मैं सोचने लगा कि मच्छर तो मच्छर, अग़र बारिश होगी तो इन्हीं नालियों और नाले का गंदा पानी निचले घरों में घुस जाएगा।

पर मैं कुछ बोला नहीं, चुप ही रहा। क्या ही बोलता!!

सोमवार, 21 सितंबर 2026

अंतिम संस्कार


 

कॉलोनी में नालियां बनाने के नाम पर पेड़ कट रहे हैं। 
अभी नालियां बनने के नाम पर कट रहे, कुछ दिनों के बाद सड़क बनने के नाम पर कटेंगे। विकास के नाम पर प्रकृति से यह ज़ोर - ज़बरदस्ती किसलिए! 
क्या इन पेड़ों के कटने के बाद इनके स्थान पर कॉलोनी में नए पेड़ - पौधे लगाए जाएंगे ताकि संतुलन बना रहे!!

चौधरी साहब एकदम भाव शून्य बैठे थे, मानो दम सा निकला जा रहा हो। 
ये पौधे उनकी बहू ने लगाए थे। तब वह इस घर मे नई-नई आई थी। 
बहू ने आते ही पहले दिन से चौका संभाल लिया था। चार दिनों बाद ही चूड़ियों भरे हाथ में खुरपा लेकर लंबा घूंघट काढ़े जब उसने घर के बाहर अपनी दीवार के साथ पौधे लगाने शुरू किये तो आसपास से गुज़रते लोग ठिठक गए थे। 

आज बहू नहीं है। कुछ साल पहले एक बीमारी में उसकी असामयिक मृत्यु हो गयी थी। 
पर चौधरी साहब को लगता था कि वह इन पेड़ों के माध्यम से जीवित है।

जब मशीन चलाई गई तो डरे हुए पेड़ों की दर्द भरी चीखें पूरी में गूंजी थी। चौधरी साहब बहुत देर तक कटे हुए पेड़ों के सामने ज़िन्दा लाश सी बनकर बैठे थे।

उन कटते पेड़ों के साथ ही आज बहू का अंतिम संस्कार भी हो गया था।
विकास की इन आंधियों में निवासियों की स्मृतियों को भी मलबे में बदलते देर नहीं लगी।


          

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

हाय! मेरी आँखें

       


                                                           

तीस के बाद अक्सर आदमी को कुछ बीमारियां घेर लेती हैं। जैसे कुछ करने की बजाए सिर्फ़ भौंकने की बीमारी, भ्रष्टाचार को अनदेखा करने की बीमारी, सुन्दरियों को देखकर सिर्फ़ ‘आह’ भरने की बीमारी और अपने बच्चों व दूसरे की बीवियों की प्रशंसा करने की बीमारी। मेरी आँखों में कुछ गड़बड़ लगती है। यूँ कहने को तो मैं कह रहा हूँ कि ज़्यादा किताबें पढ़ने के कारण यह सब हुआ है किन्तु वज़ह शायद वही है, जो ऊपर तीसरे नम्बर पर लिखी है। डॉक्टर के पास जाने से मुझे डर लगता है। वह आँखों के खराब होने के कारण पूछेगा। वह बहुत से प्रश्न पूछ सकता है। मसलन-क्या रात को मसूर की दाल साफ करते हैं? क्या दिन भर बी.एफ॰ देखते हैं? क्या दोनों आँखों से देखते हैं? आदि-आदि...। वह यह भी पूछ सकता है कि कारगिल को भारत की नज़र से देखा या पाकिस्तान की नज़र से या अमेरिका की नज़र से। कांग्रेस की नज़र से या भाजपा की नज़र से। मैं कहूंगा कि अपनी नज़र से तो वह कहेगा कि तभी तुम्हारी आँखें ख़राब हुई? इतनी बड़ी समस्या आप अपनी निजी नज़र से देखेंगे तो फिर आपकी नहीं तो क्या नवाज़ शरीफ की आँखें ख़राब होंगी? उसके प्रश्नों की संख्या विराट हो सकती है। प्रश्न उबाऊ भी हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि कोई सुन्दरी भी आपने पिताश्री अथवा पति के साथ क्लीनिक में बैठी हो और मेरी आँखों को फ़ायदा पहुंचने की बजाए नुकसान पहुंचे। इसलिये मैं डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहता।

डॉक्टर यदि महिला हुई तो प्रश्नों को नारी सम्बन्धी चौराहे पर भी ले जा सकती है। वह पूछ सकती है- ‘आप अपनी पत्नी को कैसी नज़रों से देखते हैं? रात को परेशान तो नहीं करते? करते हैं तो कितना करते है? आपकी आँखों को देखने से लगता है कि बहुत दिनों से कर रहे हैं। क्या मुआयना करते हैं? आँखों पर ज़ोर क्यों डालते है? कुछ भी करें पर कमरे में रोशनी को पर्याप्त व्यवस्था रखें। कम से कम एक फुट की दूरी अवश्य बनाये रखें....आदि-आदि।’

पुरूष डॉक्टर की जीभ ज़्यादा लम्बी होती है। जबकि ज़्यादा बोलने के आरोप महिलाओं पर ही लगते हैं। पुरूष डॉक्टर भी महिलाओं से किसी मामले में कम नहीं होते हैं। वे मरीज की अपेक्षा उसकी पत्नी के साथ बातचीत में ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं। यदि मरीज और उसकी पत्नी दोनों एक साथ अलग-अलग प्रश्न पूछते हैं तो डॉक्टर महोदय पत्नी के प्रश्न का उत्तर पहले देते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि पति जब आँखें टेस्ट कराने जाता है तो पत्नी साथ ही होती है। उसे भय होता है कि पति कहीं अंधा होकर न लौटे।

वास्तव में, मैं आँखों की उपयोगिता समझता हूँ। ईश्वर गवाह है कि मैंने आँखों से देखने के सिवाय दूसरा काम कभी नहीं लिया। मैंने इन पर कभी लोड डालने की गुस्ताखी नहीं की। दोनों को अलग-अलग कर कभी नहीं देखा। जब भी देखा दोनों आँखों से एक साथ देखा। देखने के मामले में मुझ जैसा पाबन्द और कहाँ मिलेगा, जिसने एक आँख से उतनी ही दूर देखा, जितनी दूसरी आँख से। मेरी इस नीति से किसी भी आँख को शिकायत का मौका कभी न मिला।

       आँख मारने जैसी हरकत यदि मैने कभी की भी तो परिस्थितियोंवश की। आदत कभी नहीं बनायी। जहाँ मुस्कराने से काम चल गया, वहाँ आँख मारने से बचा। शादी से पहले कभी पतिव्रता स्त्री को आँख न मारने का मेरा अपना रिकॉर्ड रहा है। यह भी शायद रिकॉर्ड है कि पहली पतिव्रता स्त्री जिसे मैंने सर्वप्रथम आँख मारी, मेरी अपनी पत्नी ही थी। मेरा एक और रिकॉर्ड शादी के बाद कुँवारी लड़कियों को आँख न मारने का है, जो अब तक क़ायम है। गांधी जी ब्रह्मचर्य का जितना कठोर पालन करते थे, लगभग उतनी ही कठोरता मैं ब्रह्मचर्य का पालन न करने में बरत रहा हूँ। और इस नैतिक कार्य में मेरी रूपमती के अतिरिक्त जिन तीन युवा स्त्रियों का सहयोग रहा, उनका मैं मन, वचन और कर्म से आभारी हूँ। ईश्वर उनकी नज़रें मुझ पर से न फिरायें। प्रश्न है, जब मैंने अपनी आंखों का इतना अधिक ध्यान रखा है तो फिर मेरी आँखें खराब हुई तो कैसे हुई?

बुधवार, 16 सितंबर 2026

मेज़ मंथन


 


जी.पी. सिंह यानी घूस प्रसाद सिंह दफ़्तर जाने लगे तो पत्नी ने आवाज़ देकर कहा, ‘‘अजी सुनते हो। मुन्ने, को भी ले जाओ, छुट्टियां है उसकी, घर में बहुत तंग करता है।’’

‘‘यह क्या करेगा वहाँ?’’

‘‘अजी, वही बैंच पर बिठा देना, देखता रहेगा आसपास का नज़ारा।’’ पत्नी ने कहा।

‘‘दफ़्तर है, पार्क नहीं, जहाँ बैंच पर बैठ कर यह आसपास का नज़ारा देखेगा?’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानती। चुपचाप ले जाओ, वरना....’’

जी. पी. सिंह ने तुरन्त मुन्ने का हाथ पकड़ा और बाहर निकल लिए। स्वभाव से शान्तिप्रिय जी. पी. सिंह झगड़ा टालने की हर संभव कोशिशों में लगे रहते हैं।

दफ़्तर पहुँचे तो घूस प्रसाद सिंह से मिलने वालों की एक लम्बी लाइन लगी थी। उन्होंने अपने पुत्र को एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बिठा दिया और स्वयं अपनी सीट पर जाकर काम करने लगे।

इधर मुन्ना कभी फाइलों को देखता तो कभी आने-जाने वालों को। फिर काफी देर तक अपने बाप को ही निहारता रहा। बाप ने उसकी ओर देखा तो चपड़ासी को बुलाकर पानी भिजवा दिया। मुन्ने ने पानी पीकर, गिलास चपड़ासी के हाथ में दिया और बाप के पास चला आया।

बाप के पास आकर वह कान में धीरे से फुसफुसाया, ‘‘पापा, आप बार-बार मेज के नीचे हाथ क्यों डाल रहे हैं?’’

उस समय उसके सामने एक ‘पार्टी’ बैठी थी। अतः घूस प्रसाद ने अपने पुत्र का कान पकड़ा और मुँह के आगे हाथ रखकर धीरे से फुसफुसाया, ‘‘अभी चुपचाप जाकर बैठो, बाद में बतलाऊंगा।’’

बच्चा समझदार था। जानता था कि ऐसे समय में मुँह बंद रखना चाहिए, अतः चुपचाप जाकर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद लंच हुआ। घूस प्रसाद ने पत्नी का दिया लंच बाक्स खोला तो बेटे ने मुँह खोल दिया-

‘‘पापा, आप मेज के नीचे हाथ क्यों डाल रहे थे?’’

‘‘तुम्हारे लिए रंगीन टी.वी. निकाल रहा था।’’ घूस प्रसाद ने इत्मीनान से बतलाया।

‘‘मेज के नीचे से?’’ बच्चा चौंका।

‘‘हाँ, बेटे!’’

‘‘मेज के नीचे टी.वी. होता है?’’

‘‘हाँ, और फ्रिज भी!’’

‘‘फ्रिज भी?’’

‘‘पिछले साल लाया था न, यहीं से निकाला था।’’

‘‘मेज के नीचे से?’’

‘‘हाँ, उससे पहले टेपरिकार्डर भी यहीं से निकाला था।’’

‘‘मेज के नीचे से?’’

‘‘हाँ।’’

‘‘और क्या-क्या निकलता है, मेज के नीचे से?’’ बच्चे में कौतूहल जगा।

‘‘तुम्हारा एडमीशन, पब्लिक स्कूल में। तुम्हारी मम्मी की साड़ियां, तुम सबका मसूरी-ट्रिप।

‘‘और?’’

‘‘बाकी बातें बाद में, पहले लंच कर लो।’’

लंच के बाद घूस प्रसाद सिंह ने पुत्र को चपड़ासी के साथ घर भेज दिया। वह नहीं चाहते थे कि मेज की पोल और अधिक खोली जाए। वह चाहते थे कि बच्चा ‘मेज के नीचे का चक्कर’ भूल जाए।

लेकिन बच्चा भूला नहीं। शाम को वह अपने दोस्त से मिला।

‘‘यार, तुझे मालूम है मेज के नीच क्या-क्या होता है?’’ उसने दोस्त से पूछा। उसे यकीन था कि दोस्त को नहीं मालूम होगा।

‘‘क्या-क्या होता है?’’ दोस्त ने पूछा।

‘‘मेज के नीचे होता है टी.वी., मेज के नीचे होता है, फ्रिज, मेज के नीचे होता है टेपरिकार्डर ओर मेरा एडमीशन।’’

 ‘’और?’’

‘‘और मम्मी की साड़ियां और हमारा मसूरी-ट्रिप।’’

‘‘और?’’ दोस्त ने पूछा।

‘‘और? और क्या?’’

‘‘मेज के नीचे होती है पापा की कार, मेज के नीचे होती है मेरी दीदी की शादी, भइया का अमरीका में एडमीशन और हमारा मकान।’’ दोस्त बोला।

‘‘तुम्हें किसने बतलाया?’’ घूस प्रसाद के पुत्र ने चौंकते हुए पूछा।

‘‘मेरे पापा ने।’’

‘‘कब?’’

‘‘जब मैं एक दिन उनके साथ दफ्तर गया था, तब।’’ दोस्त ने जबाव दिया।

 

सोमवार, 14 सितंबर 2026

अमित सर की हिंदी


केबीसी यानी कौन बनेगा करोड़पति पिछले दो - ढाई दशकों से चल रहा है। मैंने शुरू के कुछ एपिसोड्स देखे थे, फिर अमिताभ द्वारा प्रतियोगियों से सवाल पूछने की यह शैली कि "इतने रुपये पहले तो कभी देखे नहीं होंगे आपने" सुनकर मुझे बुरा लगता था  और मैंने यह कार्यक्रम देखना छोड़ दिया। अब जाकर इस साल मैंने इसे दोबारा देखना शुरू किया तो मुझे कुछ नए अनुभव हुए।

कार्यक्रम सवालों और उनके जवाबों पर केंद्रित है। लेकिन सिर्फ़ सवालों और जवाबों से दर्शक वर्ग इस कार्यक्रम को देखने के लिए इससे जुड़ा रहेगा, इस बात पर शायद इसके आयोजकों को भी यकीन नहीं था। इसलिए इसमें फीलिंग्स यानी संवेदनाओं का तड़का लगाया गया। मैं जब इस कार्यक्रम को देख रहा हूँ तो इसे तड़के के साथ ही देख रहा हूँ। कार्यक्रम में अधिकांश प्रतिभागी कमज़ोर आर्थिक स्थिति से आते हैं। उन सबकी एक स्टोरी होती है जिसे सुनकर मन द्रवित हो जाता है। हालांकि कभी-कभी मन में यह विचार भी आता है कि कहीं दर्शकों को भिगोना भी आयोजकों का एक लक्ष्य तो नहीं? लेकिन लक्ष्य हो भी तो क्या कहिएगा! कार्यक्रम में सवाल -जवाब हैं, पुरस्कार हैं, धन है, अलग अलग प्रतिभागियों की अलग-अलग कहानियां हैं, संवेदनाएं हैं, अब बीच बीच में परिस्थितियों से जुड़े फिल्मी गीत भी डाले जा रहे हैं और सबसे बड़ी बात कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन हैं, उनकी हिंदी है, उनके द्वारा बारम्बार बोली जा रहीं बधाई और शुभकामनाएं हैं।

मैंने अपने बेटे से कहा कि अनेक वर्षों बाद देख रहा हूँ इस कार्यक्रम को। जब शुरू में देखता था तो इसमें प्रतिभागी के तौर पर जाने का मन करता था। अब सोचता हूँ क्या फिर से प्रयास करूँ?

"कोई फ़ायदा नहीं, पापा। आपकी कहानी ऐसी नहीं कि वे लोग आपका चुनाव कर लें अपने प्रोग्राम के लिए और आपको बुला लें। आप तो अमिताभ सर को ऐसे ही घर बैठे देखते रहें और उनकी प्यारी हिंदी सुनकर मस्त रहें।" उसने उत्तर दिया।

"कैसे मस्त रहा जाए! आपके अमिताभ सर तो हर बात पर प्रतिभागी को बधाई दे देते हैं। बधाई और शुभकामनाओं में अंतर होता है। हिंदी दिवस पर उन्हें इस अंतर को पहचानना होगा।" -  मैं कहना चाहता हूँ पर अंततः चुप्पी लगा जाता हूँ।


रविवार, 12 मई 2019

कविता मातृ दिवस पर/ जिनकी माँ नहीं होती।

कविता (मातृ दिवस पर)
*जिनकी माँ नहीं होती*

जिन बच्चों की माँ नहीं होती
बाप ज़िम्मेदारी निभाते हैं माँ की भी
जिस तरह भगवान में आस्था होने पर
लोग पत्थर को भगवान मान लेते हैं
बच्चे भी ढूंढ लेते हैं बाप की आंखों में माँ का अक्स
पत्थर नहीं होता बाप
सिर्फ कलेजा पत्थर का रखता है
पार कराने होते हैं उसे बच्चे
भवसागर के पार

जिनकी नहीं होतीं माँ
उनकी जिम्मेदारी कहीं ज़्यादा बढ़ जाती है जीवन में
वो बहाने नहीं बना सकते माँ के लाड़ में बिगड़ जाने का
वो अपने कदमों को नियंत्रित रखते हैं
और करमों को दुरुस्त
वो प्यार की कीमत ज़्यादा जानते हैं उन बच्चों से
जिनकी माँ होती हैं

जब गली में खड़े वे बच्चे 
जिनकी माँ होती हैं
सड़क पार कराने के लिए माँ को आवाज़ लगा रहे होते हैं
वे बिना ऊँगली पकड़े भी पार कर जाते हैं ज़िन्दगी के बड़े-बड़े चौराहे
जिनकी माँ नहीं होती

माँ होनी चाहिए सभी की 
पर नहीं होती
तो इसके लिए ये बच्चे भगवान पर नहीं बिगड़ते
और न ही दोष देते हैं मुक़द्दर को 
दूसरे बच्चों की माँ को देखकर
सर्वाधिक नेह उनकी आंखों से ही टपकता है
जिनकी अपनी माँ नहीं होती

जो सौन्दर्य माँ की आंखों में होता है
वो सारा का सारा उन बच्चों की आंखों में अंतरित हो जाता है
जिन बच्चों की माँ नहीं होती

जिन बच्चों की माँ नहीं होती
उन्हें कभी घबराने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती है
उनके मस्तक पर धरती माँ का तिलक लगा होता है
मुसीबत उन पर आने से डरती है

तो बच्चों, कभी मिलो ऐसे बच्चों से 
जिनकी माँ नहीं होती
तो सम्मान के साथ मिलना
क्योंकि माँ किसी एक की नहीं होती
वो चली जाती है उनके पास
जिन्हें उनकी ज़्यादा ज़रूरत होती है

बिन माँ का होना
अधूरापन नहीं
सिम्बल है सम्पूर्णता का 
परिचायक है परिपक्वता का 
क्योंकि माँ भीतर होती है
बच्चे के।
   *जितेन्द्र 'जीतू'












शनिवार, 10 नवंबर 2018

फ़िल्म समीक्षा/ठग्स ऑफ हिंदुस्तान


             ठगों का नाम सुनकर कभी किसी काल में, बरसों पूर्व, पसीने निकल जाते होंगे। लेकिन निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य की "ठग्स ऑफ इंडिया" देखने पर पैसे निकले, पसीने नहीं। पौने तीन घंटे की इस फ़िल्म में अमिताभ हैं, आमिर हैं, कैटरीना है और फातिमा सना शेख है। इसमें आमिर का चुलबुला स्टाइल है और अमिताभ की धीर गंभीर अभिनय शैली है।

              फ़िल्म के शुरू में क्लाइव का नाम सुनते ही लगता है कि यह कहीं  रोबर्ट क्लाइव तो नहीं। लेकिन नहीं। वह क्लाइव तो 1774 को ही दिवंगत हो चुके थे जबकि फ़िल्म में 1795 की कहानी कही गयी है और यहां जॉन क्लाइव है। पूरी फिल्म में अंग्रेजों को ठगों से मात खाते दिखाया गया है। यह दो बड़े नायकों आमिर-अमिताभ की संयुक्त रूप से पहली फ़िल्म है तो ऐसा होना भी चाहिए था। दोनों ठग बने हैं लेकिन एक अंतर है। आमिर के चरित्र में कुछ विविधता है जबकि अमिताभ का वही पुराना एंग्री मैन का रूप भुनाया गया है। आमिर का गधे के ऊपर बैठकर संवाद अदायगी करना मुल्ला नसरुद्दीन नाम के बहुत पुराने चरित्र का स्मरण कराता है। 

               फ़िल्म का नाम ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान है लेकिन अमिताभ किस लिहाज़ से ठग हैं यह शोध का विषय है। अंग्रेजों के पानी के जहाज़ पर रूप बदलकर हमला करना और उन्हें लूटना बड़े ठग का काम है जबकि छोटे ठग यानी आमिर का काम काफिले के भीतर सेंध लगाकर उनका विश्वास जीतना, फिर लुटेरों को उनकी सूचना देकर लुटवाना और फिर अंग्रेजों को लुटेरों की सूचना देकर इनाम हासिल करना है। जिस तरह वे चरित्र बदलते हैं, ठग ऑफ हिन्दोस्तान ही लगते हैं।

                 इतिहास से प्रेरित स्टोरी (इतिहास नहीं) वाली इस फ़िल्म में नाच गाने के लिए रखी गई कैटरीना (सुरैया) का रोल उतना ही है जितना कि अमिताभ की फिल्मों में होता था। उनके डांस स्टेप्स 1795 के हैं, यह भी शोध का विषय है। रोनित रॉय (मिर्ज़ा सिकंदर बेग ) की जीवित बेटी और दंगल फेम फातिमा (ज़फीरा) को अमिताभ (खुदाबक्श आज़ाद) युद्ध से बचा लाते हैं। वह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में अमिताभ की सहयोगी बनी है और बिना एक्सप्रेशंस वाले सीन्स करती नज़र आती है। वस्तुतः यही किरदार फ़िल्म का बेसिक क़िरदार है। फ़िल्म की कहानी इसी किरदार को लेकर शुरू हुई थी और इसी किरदार पर खत्म होती है। बीच में बहुत कुछ है जो इस फ़िल्म को हिट कराने के लिए ज़रूरी है।

                    आंखों से अभिनय करनेवाले अमिताभ का मध्यांतर से पूर्व हटना, उनके रोल को कम करना अखरता है। इस अवधि में आमिर (फिरंगी मल्लाह) को कहानी बढ़ाने का अवसर मिलता है। लोएड  ओवन के रूप में जॉन क्लाइव जमे हैं। आमिर के दोस्त के रूप में जीशान अय्यूब (शनि) की भूमिका फाड़ू है। ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान दो पीढ़ियों के दिग्गजों के अभिनय कौशल का इम्तिहान है। इस इम्तेहान में डायरेक्टर बाद वाली पीढ़ी के साथ खड़ा दिखाई देता है। आमिर की फिल्मों की धन कमाऊ क्षमता और लोकप्रियता और अमिताभ के पक्ष में सिर्फ लोकप्रियता के चलते यह ज़रूरी लगा होगा। 

                     आजकल फिल्मों के गीतों के अधिकार पहले ही बिक जाते हैं और इससे बजट का अधिकांश हिस्सा कवर करने में मदद मिलती है। साढ़े तीन सौ करोड़ के इस सौदे में से गीत-संगीत बेचने से प्राप्त कमाई को हटाने पर जो कुछ बचता है उसे ये दोनों दिग्गज आसानी से पब्लिक से प्राप्त कर लेंगे, इसमें संदेह नहीं। आखिर दो हज़ार स्क्रीन्स के यूनिवर्सल और 5 हज़ार स्क्रीन्स के देसी राइट्स यों ही बरबाद थोड़े जाएंगे। ऐसे में अमिताभ बच्चन का आमिर खान को 1000 करोड़ कमाने का आशीर्वचन कितना प्रभावी सिद्ध हो पाता है, यह तो वक़्त ही बताएगा। 

                       कैमरे ने कमाल किया है। फाइटिंग के दृश्य फ़िल्म को फाइट में रखते हैं। गीत के बोल मौके के हैं पर तभी तक याद रहते हैं जब तक देख रहे होते हैं। संगीत पर मेहनत के साथ पॉपुलैरिटी पक्ष पर भी ध्यान दिया गया होता तो देखकर बाहर निकलने वाले दर्शक कुछ गुनगुना भी रहे होते। अमिताभ-आमिर के मध्य डायलागबाज़ी व फाइट सीन्स और आमिर के कॉमिक सीन्स पिक्चर की यू एस पी हैं।