तीस के बाद अक्सर आदमी को कुछ बीमारियां घेर लेती हैं। जैसे कुछ करने की बजाए सिर्फ़ भौंकने की बीमारी, भ्रष्टाचार को अनदेखा करने की बीमारी, सुन्दरियों को देखकर सिर्फ़ ‘आह’ भरने की बीमारी और अपने बच्चों व दूसरे की बीवियों की प्रशंसा करने की बीमारी। मेरी आँखों में कुछ गड़बड़ लगती है। यूँ कहने को तो मैं कह रहा हूँ कि ज़्यादा किताबें पढ़ने के कारण यह सब हुआ है किन्तु वज़ह शायद वही है, जो ऊपर तीसरे नम्बर पर लिखी है। डॉक्टर के पास जाने से मुझे डर लगता है। वह आँखों के खराब होने के कारण पूछेगा। वह बहुत से प्रश्न पूछ सकता है। मसलन-क्या रात को मसूर की दाल साफ करते हैं? क्या दिन भर बी.एफ॰ देखते हैं? क्या दोनों आँखों से देखते हैं? आदि-आदि...। वह यह भी पूछ सकता है कि कारगिल को भारत की नज़र से देखा या पाकिस्तान की नज़र से या अमेरिका की नज़र से। कांग्रेस की नज़र से या भाजपा की नज़र से। मैं कहूंगा कि अपनी नज़र से तो वह कहेगा कि तभी तुम्हारी आँखें ख़राब हुई? इतनी बड़ी समस्या आप अपनी निजी नज़र से देखेंगे तो फिर आपकी नहीं तो क्या नवाज़ शरीफ की आँखें ख़राब होंगी? उसके प्रश्नों की संख्या विराट हो सकती है। प्रश्न उबाऊ भी हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि कोई सुन्दरी भी आपने पिताश्री अथवा पति के साथ क्लीनिक में बैठी हो और मेरी आँखों को फ़ायदा पहुंचने की बजाए नुकसान पहुंचे। इसलिये मैं डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहता।
डॉक्टर यदि महिला हुई तो प्रश्नों को नारी सम्बन्धी चौराहे पर भी ले जा सकती है। वह पूछ सकती है- ‘आप अपनी पत्नी को कैसी नज़रों से देखते हैं? रात को परेशान तो नहीं करते? करते हैं तो कितना करते है? आपकी आँखों को देखने से लगता है कि बहुत दिनों से कर रहे हैं। क्या मुआयना करते हैं? आँखों पर ज़ोर क्यों डालते है? कुछ भी करें पर कमरे में रोशनी को पर्याप्त व्यवस्था रखें। कम से कम एक फुट की दूरी अवश्य बनाये रखें....आदि-आदि।’
पुरूष डॉक्टर की जीभ ज़्यादा लम्बी होती है। जबकि ज़्यादा बोलने के आरोप महिलाओं पर ही लगते हैं। पुरूष डॉक्टर भी महिलाओं से किसी मामले में कम नहीं होते हैं। वे मरीज की अपेक्षा उसकी पत्नी के साथ बातचीत में ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं। यदि मरीज और उसकी पत्नी दोनों एक साथ अलग-अलग प्रश्न पूछते हैं तो डॉक्टर महोदय पत्नी के प्रश्न का उत्तर पहले देते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि पति जब आँखें टेस्ट कराने जाता है तो पत्नी साथ ही होती है। उसे भय होता है कि पति कहीं अंधा होकर न लौटे।
वास्तव में, मैं आँखों की उपयोगिता समझता हूँ। ईश्वर गवाह है कि मैंने आँखों से देखने के सिवाय दूसरा काम कभी नहीं लिया। मैंने इन पर कभी लोड डालने की गुस्ताखी नहीं की। दोनों को अलग-अलग कर कभी नहीं देखा। जब भी देखा दोनों आँखों से एक साथ देखा। देखने के मामले में मुझ जैसा पाबन्द और कहाँ मिलेगा, जिसने एक आँख से उतनी ही दूर देखा, जितनी दूसरी आँख से। मेरी इस नीति से किसी भी आँख को शिकायत का मौका कभी न मिला।
आँख मारने जैसी हरकत यदि मैने कभी की भी तो परिस्थितियोंवश की। आदत कभी नहीं बनायी। जहाँ मुस्कराने से काम चल गया, वहाँ आँख मारने से बचा। शादी से पहले कभी पतिव्रता स्त्री को आँख न मारने का मेरा अपना रिकॉर्ड रहा है। यह भी शायद रिकॉर्ड है कि पहली पतिव्रता स्त्री जिसे मैंने सर्वप्रथम आँख मारी, मेरी अपनी पत्नी ही थी। मेरा एक और रिकॉर्ड शादी के बाद कुँवारी लड़कियों को आँख न मारने का है, जो अब तक क़ायम है। गांधी जी ब्रह्मचर्य का जितना कठोर पालन करते थे, लगभग उतनी ही कठोरता मैं ब्रह्मचर्य का पालन न करने में बरत रहा हूँ। और इस नैतिक कार्य में मेरी रूपमती के अतिरिक्त जिन तीन युवा स्त्रियों का सहयोग रहा, उनका मैं मन, वचन और कर्म से आभारी हूँ। ईश्वर उनकी नज़रें मुझ पर से न फिरायें। प्रश्न है, जब मैंने अपनी आंखों का इतना अधिक ध्यान रखा है तो फिर मेरी आँखें खराब हुई तो कैसे हुई?


