मंगलवार, 24 अगस्त 2010
मुल्क की आज़ादी और खाकसार की दाढ़ का दर्द
मंगलवार, 3 अगस्त 2010
क्या करेंगे आप!
शुक्रवार, 23 जुलाई 2010
अपनी दुनिया का पागल
एक अन्य परिचित जमीनें खरीदनें में ही खोये हुए हैं। खरीदते हैं, बेचते हैं, खरीदते हैं, बेचते हैं। सुना है उन्होंने अपने लिये दो गज जमीन भी खरीद ली है जिसे वे जल्दी ही अपनी पत्नी को अच्छे दामों पर रीसेल करने जा रहे हैं।
एक अन्य परिचित दारू की बोतल के साथ खोये हुए हैं। बोतल के साथ ही वे उठते हैं तथा बोतल के साथ ही सोते हैं। ऑफिस भी बोतल को साथ ही लेकर जाते हैं। हाथ में फाइलें होती हैं, लंच बाक्स होता है, और होती है दारू की बोतल। वहां बैठकर पूरा लुत्फ उठाते हैं। साहब ने फाइल पास कर दी तो खुशी के दो घूंट मार लिये और फाइल पर विपरीत टिप्पणी कर दी तो गम के चार घूँट ।
यानी हर आदमी का अपना दीन और अपना निजी ईमान होता है और वह अपनी ही दुनिया में खोया रहता है। लेखक है तो उपन्यास में और ई-लेखक है तो ब्लॉगिंग में। कवि है तो कविता में और अकवि है तो अपनी निजी 'कविता' में।
गर्ज यह है कि खोये हुए आदमी की अपनी ही दुनिया होती है। उसकी यह दुनिया उसे जीने की राह दिखाती है। वह अपनी ही दुनिया में पागल होता है, अपनी ही दुनिया का पागल होता है।
पागल आदमी के भी अनेक प्रकार होते हैं। कोई एक नम्बर का पागल होता है तो कोई परले दरजे का। कुछ पागल आपको सडकों पर घूमते और मारे-मारे फिरते दिखाई देंगे तो कुछ का स्तर इतना ऊंचा होता है कि उन्हें अपने इस विशेषण को मेन्टेन करने की पगार भी मिलती है और कुर्सी भी।
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
छोटे शहर में light
यह जानने के लिये कि छोटे शहर में चौबीस घंटों में कितनी देर लाइट आती होगी, आपको टॉयलेट मे जाने की जरूरत नहीं। यह बात आप टॉयलेट के बाहर बैठकर भी जान सकते हैं।
छोटे शहर का आदमी कम्प्यूटर के सामने अपनी ईमेल चैक करने के लिये बैठता है तो लाइट चली जाती है और आदमी बेचारा अपनी फीमेल ही देखता रह जाता है। शायद इसलिये छोटे शहर की लाइट जाने पर आदमी सीधा चीफ मिनिस्टर को कोसता है, पॉवर ग्रिड को नहीं।
लाइट जाने के बाद अंधेरे में कौन-कौन से कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं, इस पर अनगिनत पोथियां लिखी जा सकती हैं। लेकिन लाइट आने के बाद छोटे शहर का आदमी जो कार्य सर्वप्रथम करता है' वह होता है अपनी और अपने घर की बैटरियां चार्ज करना।
कुछ वर्षों पूर्व मैंने अपने एक कजिन से जो एक महानगर में रहता था, बात-बात में पूछा था कि आपके यहां लाइट कब-कब जाती है, सुनकर उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था कि मैंने तो यहां कभी लाइट जाती देखी ही नहीं।
प्रतिउत्तर में मैंने अपने कजिन का मजाक उडाया कि तुम कितने दुर्भाग्यशाली हो जो जाती हुई लाइट को आज तक देख नहीं पाये। हमें देखो कि हम एक छोटे से कस्बे में रहते हैं फिर भी इंसान के इस चमत्कार को दिन में अडतालीस दफा (उन दिनों हमारे टाउन में लाइट अडतालीस बार जाती थी) देखते हैं।
जब वह फिर मुस्कुराया तो मैंने उसे लताडा कि यह मुस्कुराने का नहीं, झेंपने का विषय है कि उसने कभी लाइट को जाते हुए नहीं देखा।
मेरी पत्नी जब कभी लाइट का संदर्भ लेते हुए छोटे शहर को छोड कर बडे शहर में शिफ्ट करने का सुझाव देती है तो मैं उसे समझाता हूं कि हमारे यहां लाइट बार-बार जा रही है तो बार-बार आ भी तो रही है। बडे शहर में तो सिर्फ एक बार ही जाती है और एक बार ही आती है।
मैं उसे यह भी समझाता हूं कि हम उनसे बेहतर स्थिति में हैं जिन गांवों में लाइट एक बार जाती है तो फिर कभी नहीं आती।
जैसे इस देश में ईमानदारी की बत्ती एक बार गुल हुई है तो उसके दर्शन अभी तक नहीं हुए।
वैसे भी बड़े शहर के सामने छोटे शहर की बत्ती हमेशा गुल ही रहती है।
कभी आधी रात को आपको, हाथ में पंखा लिये, छतों पर टहलते, पसीना सुखाते और मच्छर मारते हुए लोग छतों पर दिखाई दें तो आप समझ जाइये कि आपका हवाई जहाज लाइट आने की प्रतीक्षा में रात काटते हुए किसी छोटे शहर के ऊपर से गुजर रहा है।
सोमवार, 5 जुलाई 2010
कुत्ता-दर्शन
कुत्ता, आदमी का अच्छा मित्र होता है, यह दिव्य ज्ञान मुझे तब प्राप्त हुआ जब एक कुत्ते ने मुझे पीछे से, चुपके से, दबे पांव आकर काटा।
मेरे
नये-पुराने कई मित्र काफी समय से इस दुर्लभ अवसर को प्राप्त करने के लिए मरे जा
रहे थे किन्तु बाजी एक कुत्ता मार ले गया।
विनोदी
कुत्ते को शीघ्र ही यह दिव्य
ज्ञान प्राप्त हो गया कि उसने किसी महापुरुष को
काट लिया है। क्योंकि उसके बाद से कुत्ता बिना किसी को काटे घूम रहा है। यह भी
सुना है कि उसने अपने उन दांतों को भी सुरक्षित रख छोड़ा है और उन दांतो पर
टूथपेस्ट तक करना बंद कर दिया है जिन दांतों से उसने मुझे काट खाया था।
मेजबान
परेशान थे क्योंकि
उनके कुत्ते ने मुझे काट
लिया था।
मैंने
उन्हें सांत्वना दी कि परेशान
क्यों होते हो?
आपने थोड़े ही काटा है, आपके कुत्ते ने काटा है।
मेरे
कुछ मित्रों को इस बात का दुख है कि वे इस काटा-कार्यक्रम का लाइव-प्रसारण नहीं
देख पाये। अब वे स्थानीय केबिल वाले से इस कार्यक्रम की हाइलाइट्स दिखाने की मांग
कर रहे हैं। कुछ अन्य मित्र तो बाजार जाकर सी.डी. के बारे में भी जानकारी एकत्र कर
रहे हैं जो कि दुर्भाग्यवश और
मेरे आलसी तथा रचनात्मक स्वभाव
के होने के कारण उन्हें नहीं प्राप्त हो पायी है। पता चला है कि एक सी.डी. प्राप्त
करने के लिए वे कुत्ते हुए
जा रहे हैं।
कुत्ते
द्वारा काटे जाने के उपरान्त मैंने एक विश्लेषण
चार्ट तैयार किया और यह जानने का प्रयत्न किया कि मान्यवर के वेश में ऐसा कौन हो सकता है जो इस कुत्तेपन
को प्राप्त करने की योग्यता रखता हो। तो मेरी आंखों के सामने मेरा बॉस, मेरे कुछ सहकर्मी, मेरा एक पड़ोसी, मेरी चार प्रेमिकाओं के समस्त पति, मेरी रचनाओं को
न छापने वाले कुछ पत्रिकाओं के संपादक
और मेरी अनुपस्थिति में मेरी पत्नी को फोन करने वाले कुछ नौजवान दोस्त घूम गये।
रविवार, 27 जून 2010
झूठ
झूठ बोलना कला है, यह अब इतिहास की बातें हो गयी है। आजकल
के बच्चे कला को इतना पसन्द नही करते जितना विज्ञान को, इसीलिए झूठ को भी उन्होने विज्ञान की विषय-वस्तु बना दिया है।
झूठ बोलने की कला का नही, विज्ञान का विकास हुआ है।
झूठ बोलने की तरंगे जो हवा में घुली मिली रहती है उन्हे आजकल का
मन जल्दी कैच कर रहा है।
झूठ बोलने की सी.डी. कभी मार्केट में नही
आयी किन्तु झूठ खूब बजाया जा
रहा है। झूठ बोलने की कोई
विडियो किसी मोबाइल में
नही आयी लेकिन झूठ गहरी सांस लेकर
बाकायदा देखा जा रहा है। झूठ बोलने
की रिंगटोन कभी नहीं देखी लेकिन इसे
घर में डाउनलोड किया जा
रहा है।
झूठ बोलने की आवश्यकता जिस किसी ने नहीं समझी, उसी ने धोखा खाया। पहले झूठ कुछ खास घरों में, कुछ खास लोगों तक सीमित होता होगा, लेकिन इधर झूठ का भी खासा डिसैन्ट्रलाईजेषन यानि विकेन्द्रीकरण
हुआ है।
केन्द्र
से बाहर निकलकर झूठ ने परिधि मे
पांव पसारे है। आदमी से चूक हो रही है, लेकिन झूठ अचूक है। आदमी
मौका खो रहा है लेकिन झूठ अवसर झूठ रहा है। पहले झूठ दीमक के रोल में होता था। सच के ठूठन को धीरे
धीरे खत्म करता था।
इधर
झूठ नये अवतार में
है। वह डायनासोर का रूप धर चुका है। विलुप्त डायनासोर नही। तकनीकी रूप से हाई
एलर्ट, हाई प्रोफाईल
डायनासोर। अपनी मगरमच्छी अदाकारी से निगलने को तैयार। ‘लाई’ तरंगो के माध्यमों से सच का कलेजा बेधने को तैयार।
पैंसठ
को सत्तर, सत्तर
को अस्सी तथा अस्सी को नब्बे प्रतिषत में अपने झूठ कौशल से
बदलने को तैयार।
तेवर
भी ऐसे कि सच भी शरमा जाये। उसे भी
रास्ता बदलना पड़े। झूठ बेदर्द इतना हो गया है कि सच बिल्ली
की माफिक सामने से गुजर जाये तो झूठ अपना
रास्ता बदल ले। झूठ के मामलों मे
कोई समझौता नही, एक झूठ दो-
झूठ, सरासर झूठ,
दे-दनादन झूठ। झूठ पर झूठ ।
सच
बोलते हुए कलेजा मुँह को आता है। और झूठ बोलते हुए?
‘वो बोलना तो जरूरी है।’ आज की आवश्यकता है। इसीलिए तो बोला जाता है..सुबह से शाम तक, बिना रूके, बिना
हिचके। क्योंकि झूठ ही पार
लगायेगा।
‘‘सच तो ससुरा बेड़ा गर्क करेगा।
बुधवार, 23 जून 2010
चौथा idiot
चौथा इडियट सुनते ही दिमाग में प्रश्न कौंधता है कि पहला इडियट कौन है? दूसरा कौन और तीसरा कौन?
दो इडियट मिलकर परिवार बनाते है, परिवार से समाज, समाज से देश और देश से दुनिया बनती है।
दुनिया
में इडियटों की संख्या में
इसी तरह वृद्धि हुई होगी।
इडियट यदि एक अवधारणा है तो इसकी उत्पत्ति कब
और कहां हुई होगी, इस
बारे में इडियटों का इतिहास मौन
है।
इस
सन्दर्भ में हम जैसों को ही कुछ करना है।
कुल
मिलाकर दुनिया को यदि इडियटों के
आधार पर बांटा जाये तो दो प्रकार की दुनिया दिखाई देती है, इडियटों की
दुनिया और नॉन-इडियटों की दुनिया।
चौथा इडियट निसंदेह पहली प्रकार की दुनिया अर्थात
इडियटों की दुनिया की
वस्तु है।
दो
प्रकार के इडियट जब मिलते
होगें तो निश्चित रूप से इडियट थिंग्स के बारे मे ही बातचीत करते
होगें।
नॉन-इडियट थिंग्स भी उनके बातचीत की विषयवस्तु हो सकते है, लेकिन वे अपने इडियटपने के चलते उन्हें भी इडियट थिंग्स बना लेते होंगे।
चौथा इडियट सामाजिक प्राणी होता है या असामाजिक?
निश्चित रूप से सामाजिक। कम से कम इडियटों की दुनिया में तो सामाजिक होता है।
नॉन-इडियट उसे असामाजिक मानते है तो मानते रहें।
चौथा इडियट हमेशा अपने इडियट समाज की ही बात करता है अथवा नॉन-इडियट समाज की भी उसे कहीं न कहीं चिन्ता है?
मेरा
ख्याल है चौथा इडियट वो है जो पहले, दूसरे और तीसरे की बात भी करने में
सक्षम है, और
अन्य इडियट भी उसकी प्रिय
पर्सनैलटी हो सकते हैं।
यह भी हो सकता है कि चौथा इडियट अंतर्मुखी हो और सिर्फ अपने बारे में ही सोचे या
फिर नॉन-इडियट समाज में से वह कोई नॉन-ईडियट निकाल लाये और उसे अपना दोस्त बना ले।
दुनिया में इडियटों की एक लम्बी
रेंज है। चौथा इडियट उन्ही में से एक
है।
यह इडियटों की दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है। उन
इडियटों की दुनिया का, जो भावी सभ्य समाज की नींव रखने की
योग्यता रखते है।
जय इडियट, जय चौथा इडियट।