शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

हाय! मेरी आँखें

       


                                                           

तीस के बाद अक्सर आदमी को कुछ बीमारियां घेर लेती हैं। जैसे कुछ करने की बजाए सिर्फ़ भौंकने की बीमारी, भ्रष्टाचार को अनदेखा करने की बीमारी, सुन्दरियों को देखकर सिर्फ़ ‘आह’ भरने की बीमारी और अपने बच्चों व दूसरे की बीवियों की प्रशंसा करने की बीमारी। मेरी आँखों में कुछ गड़बड़ लगती है। यूँ कहने को तो मैं कह रहा हूँ कि ज़्यादा किताबें पढ़ने के कारण यह सब हुआ है किन्तु वज़ह शायद वही है, जो ऊपर तीसरे नम्बर पर लिखी है। डॉक्टर के पास जाने से मुझे डर लगता है। वह आँखों के खराब होने के कारण पूछेगा। वह बहुत से प्रश्न पूछ सकता है। मसलन-क्या रात को मसूर की दाल साफ करते हैं? क्या दिन भर बी.एफ॰ देखते हैं? क्या दोनों आँखों से देखते हैं? आदि-आदि...। वह यह भी पूछ सकता है कि कारगिल को भारत की नज़र से देखा या पाकिस्तान की नज़र से या अमेरिका की नज़र से। कांग्रेस की नज़र से या भाजपा की नज़र से। मैं कहूंगा कि अपनी नज़र से तो वह कहेगा कि तभी तुम्हारी आँखें ख़राब हुई? इतनी बड़ी समस्या आप अपनी निजी नज़र से देखेंगे तो फिर आपकी नहीं तो क्या नवाज़ शरीफ की आँखें ख़राब होंगी? उसके प्रश्नों की संख्या विराट हो सकती है। प्रश्न उबाऊ भी हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि कोई सुन्दरी भी आपने पिताश्री अथवा पति के साथ क्लीनिक में बैठी हो और मेरी आँखों को फ़ायदा पहुंचने की बजाए नुकसान पहुंचे। इसलिये मैं डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहता।

डॉक्टर यदि महिला हुई तो प्रश्नों को नारी सम्बन्धी चौराहे पर भी ले जा सकती है। वह पूछ सकती है- ‘आप अपनी पत्नी को कैसी नज़रों से देखते हैं? रात को परेशान तो नहीं करते? करते हैं तो कितना करते है? आपकी आँखों को देखने से लगता है कि बहुत दिनों से कर रहे हैं। क्या मुआयना करते हैं? आँखों पर ज़ोर क्यों डालते है? कुछ भी करें पर कमरे में रोशनी को पर्याप्त व्यवस्था रखें। कम से कम एक फुट की दूरी अवश्य बनाये रखें....आदि-आदि।’

पुरूष डॉक्टर की जीभ ज़्यादा लम्बी होती है। जबकि ज़्यादा बोलने के आरोप महिलाओं पर ही लगते हैं। पुरूष डॉक्टर भी महिलाओं से किसी मामले में कम नहीं होते हैं। वे मरीज की अपेक्षा उसकी पत्नी के साथ बातचीत में ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं। यदि मरीज और उसकी पत्नी दोनों एक साथ अलग-अलग प्रश्न पूछते हैं तो डॉक्टर महोदय पत्नी के प्रश्न का उत्तर पहले देते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि पति जब आँखें टेस्ट कराने जाता है तो पत्नी साथ ही होती है। उसे भय होता है कि पति कहीं अंधा होकर न लौटे।

वास्तव में, मैं आँखों की उपयोगिता समझता हूँ। ईश्वर गवाह है कि मैंने आँखों से देखने के सिवाय दूसरा काम कभी नहीं लिया। मैंने इन पर कभी लोड डालने की गुस्ताखी नहीं की। दोनों को अलग-अलग कर कभी नहीं देखा। जब भी देखा दोनों आँखों से एक साथ देखा। देखने के मामले में मुझ जैसा पाबन्द और कहाँ मिलेगा, जिसने एक आँख से उतनी ही दूर देखा, जितनी दूसरी आँख से। मेरी इस नीति से किसी भी आँख को शिकायत का मौका कभी न मिला।

       आँख मारने जैसी हरकत यदि मैने कभी की भी तो परिस्थितियोंवश की। आदत कभी नहीं बनायी। जहाँ मुस्कराने से काम चल गया, वहाँ आँख मारने से बचा। शादी से पहले कभी पतिव्रता स्त्री को आँख न मारने का मेरा अपना रिकॉर्ड रहा है। यह भी शायद रिकॉर्ड है कि पहली पतिव्रता स्त्री जिसे मैंने सर्वप्रथम आँख मारी, मेरी अपनी पत्नी ही थी। मेरा एक और रिकॉर्ड शादी के बाद कुँवारी लड़कियों को आँख न मारने का है, जो अब तक क़ायम है। गांधी जी ब्रह्मचर्य का जितना कठोर पालन करते थे, लगभग उतनी ही कठोरता मैं ब्रह्मचर्य का पालन न करने में बरत रहा हूँ। और इस नैतिक कार्य में मेरी रूपमती के अतिरिक्त जिन तीन युवा स्त्रियों का सहयोग रहा, उनका मैं मन, वचन और कर्म से आभारी हूँ। ईश्वर उनकी नज़रें मुझ पर से न फिरायें। प्रश्न है, जब मैंने अपनी आंखों का इतना अधिक ध्यान रखा है तो फिर मेरी आँखें खराब हुई तो कैसे हुई?

बुधवार, 16 सितंबर 2026

मेज़ मंथन


 


जी.पी. सिंह यानी घूस प्रसाद सिंह दफ़्तर जाने लगे तो पत्नी ने आवाज़ देकर कहा, ‘‘अजी सुनते हो। मुन्ने, को भी ले जाओ, छुट्टियां है उसकी, घर में बहुत तंग करता है।’’

‘‘यह क्या करेगा वहाँ?’’

‘‘अजी, वही बैंच पर बिठा देना, देखता रहेगा आसपास का नज़ारा।’’ पत्नी ने कहा।

‘‘दफ़्तर है, पार्क नहीं, जहाँ बैंच पर बैठ कर यह आसपास का नज़ारा देखेगा?’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानती। चुपचाप ले जाओ, वरना....’’

जी. पी. सिंह ने तुरन्त मुन्ने का हाथ पकड़ा और बाहर निकल लिए। स्वभाव से शान्तिप्रिय जी. पी. सिंह झगड़ा टालने की हर संभव कोशिशों में लगे रहते हैं।

दफ़्तर पहुँचे तो घूस प्रसाद सिंह से मिलने वालों की एक लम्बी लाइन लगी थी। उन्होंने अपने पुत्र को एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बिठा दिया और स्वयं अपनी सीट पर जाकर काम करने लगे।

इधर मुन्ना कभी फाइलों को देखता तो कभी आने-जाने वालों को। फिर काफी देर तक अपने बाप को ही निहारता रहा। बाप ने उसकी ओर देखा तो चपड़ासी को बुलाकर पानी भिजवा दिया। मुन्ने ने पानी पीकर, गिलास चपड़ासी के हाथ में दिया और बाप के पास चला आया।

बाप के पास आकर वह कान में धीरे से फुसफुसाया, ‘‘पापा, आप बार-बार मेज के नीचे हाथ क्यों डाल रहे हैं?’’

उस समय उसके सामने एक ‘पार्टी’ बैठी थी। अतः घूस प्रसाद ने अपने पुत्र का कान पकड़ा और मुँह के आगे हाथ रखकर धीरे से फुसफुसाया, ‘‘अभी चुपचाप जाकर बैठो, बाद में बतलाऊंगा।’’

बच्चा समझदार था। जानता था कि ऐसे समय में मुँह बंद रखना चाहिए, अतः चुपचाप जाकर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद लंच हुआ। घूस प्रसाद ने पत्नी का दिया लंच बाक्स खोला तो बेटे ने मुँह खोल दिया-

‘‘पापा, आप मेज के नीचे हाथ क्यों डाल रहे थे?’’

‘‘तुम्हारे लिए रंगीन टी.वी. निकाल रहा था।’’ घूस प्रसाद ने इत्मीनान से बतलाया।

‘‘मेज के नीचे से?’’ बच्चा चौंका।

‘‘हाँ, बेटे!’’

‘‘मेज के नीचे टी.वी. होता है?’’

‘‘हाँ, और फ्रिज भी!’’

‘‘फ्रिज भी?’’

‘‘पिछले साल लाया था न, यहीं से निकाला था।’’

‘‘मेज के नीचे से?’’

‘‘हाँ, उससे पहले टेपरिकार्डर भी यहीं से निकाला था।’’

‘‘मेज के नीचे से?’’

‘‘हाँ।’’

‘‘और क्या-क्या निकलता है, मेज के नीचे से?’’ बच्चे में कौतूहल जगा।

‘‘तुम्हारा एडमीशन, पब्लिक स्कूल में। तुम्हारी मम्मी की साड़ियां, तुम सबका मसूरी-ट्रिप।

‘‘और?’’

‘‘बाकी बातें बाद में, पहले लंच कर लो।’’

लंच के बाद घूस प्रसाद सिंह ने पुत्र को चपड़ासी के साथ घर भेज दिया। वह नहीं चाहते थे कि मेज की पोल और अधिक खोली जाए। वह चाहते थे कि बच्चा ‘मेज के नीचे का चक्कर’ भूल जाए।

लेकिन बच्चा भूला नहीं। शाम को वह अपने दोस्त से मिला।

‘‘यार, तुझे मालूम है मेज के नीच क्या-क्या होता है?’’ उसने दोस्त से पूछा। उसे यकीन था कि दोस्त को नहीं मालूम होगा।

‘‘क्या-क्या होता है?’’ दोस्त ने पूछा।

‘‘मेज के नीचे होता है टी.वी., मेज के नीचे होता है, फ्रिज, मेज के नीचे होता है टेपरिकार्डर ओर मेरा एडमीशन।’’

 ‘’और?’’

‘‘और मम्मी की साड़ियां और हमारा मसूरी-ट्रिप।’’

‘‘और?’’ दोस्त ने पूछा।

‘‘और? और क्या?’’

‘‘मेज के नीचे होती है पापा की कार, मेज के नीचे होती है मेरी दीदी की शादी, भइया का अमरीका में एडमीशन और हमारा मकान।’’ दोस्त बोला।

‘‘तुम्हें किसने बतलाया?’’ घूस प्रसाद के पुत्र ने चौंकते हुए पूछा।

‘‘मेरे पापा ने।’’

‘‘कब?’’

‘‘जब मैं एक दिन उनके साथ दफ्तर गया था, तब।’’ दोस्त ने जबाव दिया।

 

सोमवार, 14 सितंबर 2026

अमित सर की हिंदी


केबीसी यानी कौन बनेगा करोड़पति पिछले दो - ढाई दशकों से चल रहा है। मैंने शुरू के कुछ एपिसोड्स देखे थे, फिर अमिताभ द्वारा प्रतियोगियों से सवाल पूछने की यह शैली कि "इतने रुपये पहले तो कभी देखे नहीं होंगे आपने" सुनकर मुझे बुरा लगता था  और मैंने यह कार्यक्रम देखना छोड़ दिया। अब जाकर इस साल मैंने इसे दोबारा देखना शुरू किया तो मुझे कुछ नए अनुभव हुए।

कार्यक्रम सवालों और उनके जवाबों पर केंद्रित है। लेकिन सिर्फ़ सवालों और जवाबों से दर्शक वर्ग इस कार्यक्रम को देखने के लिए इससे जुड़ा रहेगा, इस बात पर शायद इसके आयोजकों को भी यकीन नहीं था। इसलिए इसमें फीलिंग्स यानी संवेदनाओं का तड़का लगाया गया। मैं जब इस कार्यक्रम को देख रहा हूँ तो इसे तड़के के साथ ही देख रहा हूँ। कार्यक्रम में अधिकांश प्रतिभागी कमज़ोर आर्थिक स्थिति से आते हैं। उन सबकी एक स्टोरी होती है जिसे सुनकर मन द्रवित हो जाता है। हालांकि कभी-कभी मन में यह विचार भी आता है कि कहीं दर्शकों को भिगोना भी आयोजकों का एक लक्ष्य तो नहीं? लेकिन लक्ष्य हो भी तो क्या कहिएगा! कार्यक्रम में सवाल -जवाब हैं, पुरस्कार हैं, धन है, अलग अलग प्रतिभागियों की अलग-अलग कहानियां हैं, संवेदनाएं हैं, अब बीच बीच में परिस्थितियों से जुड़े फिल्मी गीत भी डाले जा रहे हैं और सबसे बड़ी बात कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन हैं, उनकी हिंदी है, उनके द्वारा बारम्बार बोली जा रहीं बधाई और शुभकामनाएं हैं।

मैंने अपने बेटे से कहा कि अनेक वर्षों बाद देख रहा हूँ इस कार्यक्रम को। जब शुरू में देखता था तो इसमें प्रतिभागी के तौर पर जाने का मन करता था। अब सोचता हूँ क्या फिर से प्रयास करूँ?

"कोई फ़ायदा नहीं, पापा। आपकी कहानी ऐसी नहीं कि वे लोग आपका चुनाव कर लें अपने प्रोग्राम के लिए और आपको बुला लें। आप तो अमिताभ सर को ऐसे ही घर बैठे देखते रहें और उनकी प्यारी हिंदी सुनकर मस्त रहें।" उसने उत्तर दिया।

"कैसे मस्त रहा जाए! आपके अमिताभ सर तो हर बात पर प्रतिभागी को बधाई दे देते हैं। बधाई और शुभकामनाओं में अंतर होता है। हिंदी दिवस पर उन्हें इस अंतर को पहचानना होगा।" -  मैं कहना चाहता हूँ पर अंततः चुप्पी लगा जाता हूँ।