सोमवार, 14 सितंबर 2026

अमित सर की हिंदी


केबीसी यानी कौन बनेगा करोड़पति पिछले दो - ढाई दशकों से चल रहा है। मैंने शुरू के कुछ एपिसोड्स देखे थे, फिर अमिताभ द्वारा प्रतियोगियों से सवाल पूछने की यह शैली कि "इतने रुपये पहले तो कभी देखे नहीं होंगे आपने" सुनकर मुझे बुरा लगता था  और मैंने यह कार्यक्रम देखना छोड़ दिया। अब जाकर इस साल मैंने इसे दोबारा देखना शुरू किया तो मुझे कुछ नए अनुभव हुए।

कार्यक्रम सवालों और उनके जवाबों पर केंद्रित है। लेकिन सिर्फ़ सवालों और जवाबों से दर्शक वर्ग इस कार्यक्रम को देखने के लिए इससे जुड़ा रहेगा, इस बात पर शायद इसके आयोजकों को भी यकीन नहीं था। इसलिए इसमें फीलिंग्स यानी संवेदनाओं का तड़का लगाया गया। मैं जब इस कार्यक्रम को देख रहा हूँ तो इसे तड़के के साथ ही देख रहा हूँ। कार्यक्रम में अधिकांश प्रतिभागी कमज़ोर आर्थिक स्थिति से आते हैं। उन सबकी एक स्टोरी होती है जिसे सुनकर मन द्रवित हो जाता है। हालांकि कभी-कभी मन में यह विचार भी आता है कि कहीं दर्शकों को भिगोना भी आयोजकों का एक लक्ष्य तो नहीं? लेकिन लक्ष्य हो भी तो क्या कहिएगा! कार्यक्रम में सवाल -जवाब हैं, पुरस्कार हैं, धन है, अलग अलग प्रतिभागियों की अलग-अलग कहानियां हैं, संवेदनाएं हैं, अब बीच बीच में परिस्थितियों से जुड़े फिल्मी गीत भी डाले जा रहे हैं और सबसे बड़ी बात कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन हैं, उनकी हिंदी है, उनके द्वारा बारम्बार बोली जा रहीं बधाई और शुभकामनाएं हैं।

मैंने अपने बेटे से कहा कि अनेक वर्षों बाद देख रहा हूँ इस कार्यक्रम को। जब शुरू में देखता था तो इसमें प्रतिभागी के तौर पर जाने का मन करता था। अब सोचता हूँ क्या फिर से प्रयास करूँ?

"कोई फ़ायदा नहीं, पापा। आपकी कहानी ऐसी नहीं कि वे लोग आपका चुनाव कर लें अपने प्रोग्राम के लिए और आपको बुला लें। आप तो अमिताभ सर को ऐसे ही घर बैठे देखते रहें और उनकी प्यारी हिंदी सुनकर मस्त रहें।" उसने उत्तर दिया।

"कैसे मस्त रहा जाए! आपके अमिताभ सर तो हर बात पर प्रतिभागी को बधाई दे देते हैं। बधाई और शुभकामनाओं में अंतर होता है। हिंदी दिवस पर उन्हें इस अंतर को पहचानना होगा।" -  मैं कहना चाहता हूँ पर अंततः चुप्पी लगा जाता हूँ।