बुधवार, 16 सितंबर 2026

मेज़ मंथन


 


जी.पी. सिंह यानी घूस प्रसाद सिंह दफ़्तर जाने लगे तो पत्नी ने आवाज़ देकर कहा, ‘‘अजी सुनते हो। मुन्ने, को भी ले जाओ, छुट्टियां है उसकी, घर में बहुत तंग करता है।’’

‘‘यह क्या करेगा वहाँ?’’

‘‘अजी, वही बैंच पर बिठा देना, देखता रहेगा आसपास का नज़ारा’’ पत्नी ने कहा।

‘‘दफ़्तर है, पार्क नहीं, जहाँ बैंच पर बैठ कर यह आसपास का नज़ारा देखेगा?’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानती। चुपचाप ले जाओ, वरना....’’

जी. पी. सिंह ने तुरन्त मुन्ने का हाथ पकड़ा और बाहर निकल लिए। स्वभाव से शान्तिप्रिय जी. पी. सिंह झगड़ा टालने की हर संभव कोशिशों में लगे रहते हैं

दफ़्तर पहुँचे तो घूस प्रसाद सिंह से मिलने वालों की एक लम्बी लाइन लगी थी। उन्होंने अपने पुत्र को एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बिठा दिया और स्वयं अपनी सीट पर जाकर काम करने लगे।

इधर मुन्ना कभी फाइलों को देखता तो कभी आने-जाने वालों को। फिर काफी देर तक अपने बाप को ही निहारता रहा। बाप ने उसकी ओर देखा तो चपड़ासी को बुलाकर पानी भिजवा दिया। मुन्ने ने पानी पीकर, गिलास चपड़ासी के हाथ में दिया और बाप के पास चला आया।

बाप के पास आकर वह कान में धीरे से फुसफुसाया, ‘‘पापा, आप बार-बार मेज के नीचे हाथ क्यों डाल रहे हैं?’’

उस समय उसके सामने एक पार्टीबैठी थी। अतः घूस प्रसाद ने अपने पुत्र का कान पकड़ा और मुँह के आगे हाथ रखकर धीरे से फुसफुसाया, ‘‘अभी चुपचाप जाकर बैठो, बाद में बतलाऊंगा।’’

बच्चा समझदार था। जानता था कि ऐसे समय में मुँह बंद रखना चाहिए, अतः चुपचाप जाकर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद लंच हुआ। घूस प्रसाद ने पत्नी का दिया लंच बाक्स खोला तो बेटे ने मुँह खोल दिया-

‘‘पापा, आप मेज के नीचे हाथ क्यों डाल रहे थे?’’

‘‘तुम्हारे लिए रंगीन टी.वी. निकाल रहा था।’’ घूस प्रसाद ने इत्मीनान से बतलाया।

‘‘मेज के नीचे से?’’ बच्चा चौंका

‘‘हाँ, बेटे!’’

‘‘मेज के नीचे टी.वी. होता है?’’

‘‘हाँ, और फ्रिज भी!’’

‘‘फ्रिज भी?’’

‘‘पिछले साल लाया था न, यहीं से निकाला था।’’

‘‘मेज के नीचे से?’’

‘‘हाँ, उससे पहले टेपरिकार्डर भी यहीं से निकाला था।’’

‘‘मेज के नीचे से?’’

‘‘हाँ’’

‘‘और क्या-क्या निकलता है, मेज के नीचे से?’’ बच्चे में कौतूहल जगा।

‘‘तुम्हारा एडमीशन, पब्लिक स्कूल में। तुम्हारी मम्मी की साड़ियां, तुम सबका मसूरी-ट्रिप।

‘‘और?’’

‘‘बाकी बातें बाद में, पहले लंच कर लो।’’

लंच के बाद घूस प्रसाद सिंह ने पुत्र को चपड़ासी के साथ घर भेज दिया। वह नहीं चाहते थे कि मेज की पोल और अधिक खोली जाए। वह चाहते थे कि बच्चा मेज के नीचे का चक्करभूल जाए।

लेकिन बच्चा भूला नहीं। शाम को वह अपने दोस्त से मिला।

‘‘यार, तुझे मालूम है मेज के नीच क्या-क्या होता है?’’ उसने दोस्त से पूछा। उसे यकीन था कि दोस्त को नहीं मालूम होगा।

‘‘क्या-क्या होता है?’’ दोस्त ने पूछा।

‘‘मेज के नीचे होता है टी.वी., मेज के नीचे होता है, फ्रिज, मेज के नीचे होता है टेपरिकार्डर ओर मेरा एडमीशन।’’

 ‘’और?’’

‘‘और मम्मी की साड़ियां और हमारा मसूरी-ट्रिप।’’

‘‘और?’’ दोस्त ने पूछा।

‘‘और? और क्या?’’

‘‘मेज के नीचे होती है पापा की कार, मेज के नीचे होती है मेरी दीदी की शादी, भइया का अमरीका में एडमीशन और हमारा मकान।’’ दोस्त बोला।

‘‘तुम्हें किसने बतलाया?’’ घूस प्रसाद के पुत्र ने चौंकते हुए पूछा।

‘‘मेरे पापा ने।’’

‘‘कब?’’

‘‘जब मैं एक दिन उनके साथ दफ्तर गया था, तब।’’ दोस्त ने जबाव दिया।

 

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