कॉलोनी में नालियां बनाने के नाम पर पेड़ कट रहे हैं।
अभी नालियां बनने के नाम पर कट रहे, कुछ दिनों के बाद सड़क बनने के नाम पर कटेंगे। विकास के नाम पर प्रकृति से यह ज़ोर - ज़बरदस्ती किसलिए!
क्या इन पेड़ों के कटने के बाद इनके स्थान पर कॉलोनी में नए पेड़ - पौधे लगाए जाएंगे ताकि संतुलन बना रहे!!
चौधरी साहब एकदम भाव शून्य बैठे थे, मानो दम सा निकला जा रहा हो।
ये पौधे उनकी बहू ने लगाए थे। तब वह इस घर मे नई-नई आई थी।
बहू ने आते ही पहले दिन से चौका संभाल लिया था। चार दिनों बाद ही चूड़ियों भरे हाथ में खुरपा लेकर लंबा घूंघट काढ़े जब उसने घर के बाहर अपनी दीवार के साथ पौधे लगाने शुरू किये तो आसपास से गुज़रते लोग ठिठक गए थे।
आज बहू नहीं है। कुछ साल पहले एक बीमारी में उसकी असामयिक मृत्यु हो गयी थी।
पर चौधरी साहब को लगता था कि वह इन पेड़ों के माध्यम से जीवित है।
जब मशीन चलाई गई तो डरे हुए पेड़ों की दर्द भरी चीखें पूरी में गूंजी थी। चौधरी साहब बहुत देर तक कटे हुए पेड़ों के सामने ज़िन्दा लाश सी बनकर बैठे थे।
उन कटते पेड़ों के साथ ही आज बहू का अंतिम संस्कार भी हो गया था।
विकास की इन आंधियों में निवासियों की स्मृतियों को भी मलबे में बदलते देर नहीं लगी।
