झूठ बोलना कला है, यह अब इतिहास की बातें हो गयी है। आजकल
के बच्चे कला को इतना पसन्द नही करते जितना विज्ञान को, इसीलिए झूठ को भी उन्होने विज्ञान की विषय-वस्तु बना दिया है।
झूठ बोलने की कला का नही, विज्ञान का विकास हुआ है।
झूठ बोलने की तरंगे जो हवा में घुली मिली रहती है उन्हे आजकल का
मन जल्दी कैच कर रहा है।
झूठ बोलने की सी.डी. कभी मार्केट में नही
आयी किन्तु झूठ खूब बजाया जा
रहा है। झूठ बोलने की कोई
विडियो किसी मोबाइल में
नही आयी लेकिन झूठ गहरी सांस लेकर
बाकायदा देखा जा रहा है। झूठ बोलने
की रिंगटोन कभी नहीं देखी लेकिन इसे
घर में डाउनलोड किया जा
रहा है।
झूठ बोलने की आवश्यकता जिस किसी ने नहीं समझी, उसी ने धोखा खाया। पहले झूठ कुछ खास घरों में, कुछ खास लोगों तक सीमित होता होगा, लेकिन इधर झूठ का भी खासा डिसैन्ट्रलाईजेषन यानि विकेन्द्रीकरण
हुआ है।
केन्द्र
से बाहर निकलकर झूठ ने परिधि मे
पांव पसारे है। आदमी से चूक हो रही है, लेकिन झूठ अचूक है। आदमी
मौका खो रहा है लेकिन झूठ अवसर झूठ रहा है। पहले झूठ दीमक के रोल में होता था। सच के ठूठन को धीरे
धीरे खत्म करता था।
इधर
झूठ नये अवतार में
है। वह डायनासोर का रूप धर चुका है। विलुप्त डायनासोर नही। तकनीकी रूप से हाई
एलर्ट, हाई प्रोफाईल
डायनासोर। अपनी मगरमच्छी अदाकारी से निगलने को तैयार। ‘लाई’ तरंगो के माध्यमों से सच का कलेजा बेधने को तैयार।
पैंसठ
को सत्तर, सत्तर
को अस्सी तथा अस्सी को नब्बे प्रतिषत में अपने झूठ कौशल से
बदलने को तैयार।
तेवर
भी ऐसे कि सच भी शरमा जाये। उसे भी
रास्ता बदलना पड़े। झूठ बेदर्द इतना हो गया है कि सच बिल्ली
की माफिक सामने से गुजर जाये तो झूठ अपना
रास्ता बदल ले। झूठ के मामलों मे
कोई समझौता नही, एक झूठ दो-
झूठ, सरासर झूठ,
दे-दनादन झूठ। झूठ पर झूठ ।
सच
बोलते हुए कलेजा मुँह को आता है। और झूठ बोलते हुए?
‘वो बोलना तो जरूरी है।’ आज की आवश्यकता है। इसीलिए तो बोला जाता है..सुबह से शाम तक, बिना रूके, बिना
हिचके। क्योंकि झूठ ही पार
लगायेगा।
‘‘सच तो ससुरा बेड़ा गर्क करेगा।
प्रिय भाई,
जवाब देंहटाएंब्लॉगिंग की दुनिया में सफलतापूर्वक कदम रखने पर बहुत-बहुत बधाई। दोनों आलेख अच्छे हैं। मुझे दरअसल आज ही अपने ईडियटपने का पता चला। आभारी हूँ।
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