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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

हाय! मेरी आँखें

       


                                                           

तीस के बाद अक्सर आदमी को कुछ बीमारियां घेर लेती हैं। जैसे कुछ करने की बजाए सिर्फ़ भौंकने की बीमारी, भ्रष्टाचार को अनदेखा करने की बीमारी, सुन्दरियों को देखकर सिर्फ़ ‘आह’ भरने की बीमारी और अपने बच्चों व दूसरे की बीवियों की प्रशंसा करने की बीमारी। मेरी आँखों में कुछ गड़बड़ लगती है। यूँ कहने को तो मैं कह रहा हूँ कि ज़्यादा किताबें पढ़ने के कारण यह सब हुआ है किन्तु वज़ह शायद वही है, जो ऊपर तीसरे नम्बर पर लिखी है। डॉक्टर के पास जाने से मुझे डर लगता है। वह आँखों के खराब होने के कारण पूछेगा। वह बहुत से प्रश्न पूछ सकता है। मसलन-क्या रात को मसूर की दाल साफ करते हैं? क्या दिन भर बी.एफ॰ देखते हैं? क्या दोनों आँखों से देखते हैं? आदि-आदि...। वह यह भी पूछ सकता है कि कारगिल को भारत की नज़र से देखा या पाकिस्तान की नज़र से या अमेरिका की नज़र से। कांग्रेस की नज़र से या भाजपा की नज़र से। मैं कहूंगा कि अपनी नज़र से तो वह कहेगा कि तभी तुम्हारी आँखें ख़राब हुई? इतनी बड़ी समस्या आप अपनी निजी नज़र से देखेंगे तो फिर आपकी नहीं तो क्या नवाज़ शरीफ की आँखें ख़राब होंगी? उसके प्रश्नों की संख्या विराट हो सकती है। प्रश्न उबाऊ भी हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि कोई सुन्दरी भी आपने पिताश्री अथवा पति के साथ क्लीनिक में बैठी हो और मेरी आँखों को फ़ायदा पहुंचने की बजाए नुकसान पहुंचे। इसलिये मैं डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहता।

डॉक्टर यदि महिला हुई तो प्रश्नों को नारी सम्बन्धी चौराहे पर भी ले जा सकती है। वह पूछ सकती है- ‘आप अपनी पत्नी को कैसी नज़रों से देखते हैं? रात को परेशान तो नहीं करते? करते हैं तो कितना करते है? आपकी आँखों को देखने से लगता है कि बहुत दिनों से कर रहे हैं। क्या मुआयना करते हैं? आँखों पर ज़ोर क्यों डालते है? कुछ भी करें पर कमरे में रोशनी को पर्याप्त व्यवस्था रखें। कम से कम एक फुट की दूरी अवश्य बनाये रखें....आदि-आदि।’

पुरूष डॉक्टर की जीभ ज़्यादा लम्बी होती है। जबकि ज़्यादा बोलने के आरोप महिलाओं पर ही लगते हैं। पुरूष डॉक्टर भी महिलाओं से किसी मामले में कम नहीं होते हैं। वे मरीज की अपेक्षा उसकी पत्नी के साथ बातचीत में ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं। यदि मरीज और उसकी पत्नी दोनों एक साथ अलग-अलग प्रश्न पूछते हैं तो डॉक्टर महोदय पत्नी के प्रश्न का उत्तर पहले देते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि पति जब आँखें टेस्ट कराने जाता है तो पत्नी साथ ही होती है। उसे भय होता है कि पति कहीं अंधा होकर न लौटे।

वास्तव में, मैं आँखों की उपयोगिता समझता हूँ। ईश्वर गवाह है कि मैंने आँखों से देखने के सिवाय दूसरा काम कभी नहीं लिया। मैंने इन पर कभी लोड डालने की गुस्ताखी नहीं की। दोनों को अलग-अलग कर कभी नहीं देखा। जब भी देखा दोनों आँखों से एक साथ देखा। देखने के मामले में मुझ जैसा पाबन्द और कहाँ मिलेगा, जिसने एक आँख से उतनी ही दूर देखा, जितनी दूसरी आँख से। मेरी इस नीति से किसी भी आँख को शिकायत का मौका कभी न मिला।

       आँख मारने जैसी हरकत यदि मैने कभी की भी तो परिस्थितियोंवश की। आदत कभी नहीं बनायी। जहाँ मुस्कराने से काम चल गया, वहाँ आँख मारने से बचा। शादी से पहले कभी पतिव्रता स्त्री को आँख न मारने का मेरा अपना रिकॉर्ड रहा है। यह भी शायद रिकॉर्ड है कि पहली पतिव्रता स्त्री जिसे मैंने सर्वप्रथम आँख मारी, मेरी अपनी पत्नी ही थी। मेरा एक और रिकॉर्ड शादी के बाद कुँवारी लड़कियों को आँख न मारने का है, जो अब तक क़ायम है। गांधी जी ब्रह्मचर्य का जितना कठोर पालन करते थे, लगभग उतनी ही कठोरता मैं ब्रह्मचर्य का पालन न करने में बरत रहा हूँ। और इस नैतिक कार्य में मेरी रूपमती के अतिरिक्त जिन तीन युवा स्त्रियों का सहयोग रहा, उनका मैं मन, वचन और कर्म से आभारी हूँ। ईश्वर उनकी नज़रें मुझ पर से न फिरायें। प्रश्न है, जब मैंने अपनी आंखों का इतना अधिक ध्यान रखा है तो फिर मेरी आँखें खराब हुई तो कैसे हुई?

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

एक गरीब की दीपावली

                           
यह एक गरीब था और दीपावली मनाना चाहता था। किन्तु उसे दुःख था कि वह गरीब है और दीपावली धूमधाम से नहीं मना सकता। वह अपनी गरीबी पर इस हद तक शर्मिन्दा था कि एक बार तो उसने यह तय कर लिया कि वह दीपावली नहीं मनायेगा। किन्तु दूसरे क्षण उसने सोचा कि यदि वह दीपावली नहीं मनायेगा तो आसपास वाले क्या सोचेंगे।वे कहेंगे कि जब वह अपनी कन्या का प्रवेश एक महंगे और शहर के प्रतिष्ठित विद्यालय में करा सकता है तो दीपावली धूमधाम से क्यों नहीं मना सकता। वह इसका उत्तर सोचने लगा। थोड़ी देर में उसने जबाव तैयार कर लिया। जवाब यह था कि महंगे और प्रतिष्ठित स्कूल में दाखिला दिलाने के बाद उसके पास इतने पैसे नहीं बचे थे कि वह दीपावली धूमधाम से मना सके। पर जब जवाब उसे जंचा नहीं तब वह और  चीजों के भाव मालूम करने बाजार चला गया।
उसने खील, बताशों, खिलौनों से लेकर मिठाईयों-फ्रूटों और ड्राईफ्रूटों के बाज़ार भाव मालूम किये। हर चीज़ पिछले वर्ष के मुकाबले महंगी हो गयी थी। दाम लगभग ड्योढ़े हो गये थे। केवल काजू के भाव में ही वृद्धि इतनी अधिक नहीं हुयी थी जितना उसका अनुमान था। अतः उसने अनमने भाव से काजू के पैकेट्स खरीदे और घर ले आया। घर आकर उसने पिछले वर्ष का सूची-पत्र निकाला। कुछ पुराने नामों को काटा और नये नामों को जोड़ा। व्यक्तित्व के भार के अनुसार में उसने डिब्बों के भारों को रखा और चिटें चिपका दीं। इसके बाद वह निश्चित हो गया और पड़कर सो गया।
किन्तु चिन्ता ने उसे जगा दिया। काजुओं में उसका खर्चा बहुत हो गया था और वह गरीब था। उसने सोचा, अभी भी कुछ नाम ऐसे रह गये थे जिन्हें दीपावली के शुभअवसर पर काजू भेजे जा सकते थे। किन्तु वह गरीब था इसलिये काजू के और डिब्बे अफोर्ड नहीं कर सकता था। वह रात भर सोचता रहा कि कल बच्चे पटाखे, फुलझडि़याँ और राकेट माँगेगे तो वह क्या जवाब देगा। इसी चिन्ता में सुबह हो गयी।
सुबह बच्चों ने उसके हाथ में लिस्ट दे दी। लिस्ट में नाना प्रकार के पटाखों के नाम थे जिनका नाम वह अब से पूर्व बिल्कुल नहीं जानता था। कुछ पटाखों के नाम तो अन्तरिक्ष में छोड़े गये उपग्रहों और ईराक-ईरान युद्ध में प्रयोग किये गये प्रक्षेपास्त्रों से इतने अधिक मिलते थे कि एक बार तो उसे भय लगा कि अमेरिका को पता चल गया तो कहीं वह नाराज़ न हो जाये। वह कमाता तो बहुत था पर डरता भी उसी अनुपात में था। ज्यादा कमाने वाले ज्यादा डरते क्यों है? उसने सोचा पर दूसरे ही क्षण वह इस प्रश्न पर विचार करने लगा कि ज्यादा कमाने के बावजूद वह गरीब क्यों है।बहरहाल लिस्ट लेकर वह बाजार गया और ख्ूाब सारी मिसाइलें व एटम बम खरीदे। एक अनुमान के अनुसार उसने अपनी आय का साढ़े बारह प्रतिशत इन आयुधों पर व्यय कर दिया था और वह कई मुल्कों के रक्षा बजट के प्रतिशत से कहीं अधिक था। जब वह अपनी नई कार पर इन एटम बमों और मिसाइलों को लादकर ला रहा था तो कार की पिछली सींट व डिक्की पूरी तरह भरी हुयी थी और कार उसे किसी टैंक से कम प्रतीत नहीं हो रही थी। कार को ड्राईव करते वक्त उसे ऐसा लगा कि वह थलसेना का कोई बड़ा अधिकारी है और दुश्मनों के छक्के छुड़ाने जा रहा है।
लेकिन थोड़ी ही देर में उसे याद आया कि गरीब होने के बावजूद इस मद में वह काफी खर्चा कर चुका है और वह सोचकर वह फिर परेशान हो गया।
घर लौटा तो उसकी पत्नी ने याद दिलाया कि अभी बंगले की सजावट नहीं हुयी है और जब तक बंगले को सजाया नहीं जायेगा, दीपावली मनाने में खासी दिक्कतें आयेगी। उसने भी सोचा कि गरीब से गरीब अपनी दीपावली अच्छी मनाना चाहता है। वह भी चूँकि गरीब है इसलिये दीपावली जरूर अच्छी मनायेगा। उसने सजावट वाले को टेलीफोन किया और उससे कहा कि वह उसके बंगले की सजावट इस तरह करे कि वह किसी राजा के महल की तरह लगे। उसने यह भी निर्देश दिया कि ऐसी सजावट किसी और बंगले की नहीं होनी चाहिये, इसके बाद उसने रिसीवर रख दिया।
हालांकि वह बंगले को ताजमहल बनाना चाहता था पर इसमें पैसे बहुत लगते। इतने पैसे उसके पास नहीं थे। वह गरीब जो था। इसलिये उसे मन मसोस कर रह जाना पड़ा।
दीपावली के बाद उसने हिसाब लगाया तो उसे हैरान हो जाना पड़ा कि उसके कई हजार रूपये दीपावली की भेंट गये थे। उसे बहुत दुख हुआ।
वह दुखी इसलिये हुआ क्योंकि वह गरीब था और दीपावली धूमधाम से नहीं मना सका था।



 

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

डेमोक्रेसी का डेकोरम

कल स्वतन्त्रता दिवस है। यह बहस का विषय हो नहीं सकता। इस मामले में बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं है। और फिर बहस तो छोटे बच्चों का विषय है। 
जब तिरंगे, बिकने के लिए दुकानों में आ गये हों और बच्चों को यह कह दिया गया हो कि सभी बच्चे अलसुबह खाली पेट, झंडा लेकर कल स्कूल में उपस्थित हों तो अब तो शंका की गंुजायश ही नहीं बचती कि कल स्वतंत्रता दिवस है। 
हम जिसका इंतजार नहीं कर रहे थे वह दिन कल फिर आ जायेगा। बच्चों को स्कूल जाना पड़ेगा। सच मानिये, जब से मिड डे मील, लास्ट डे मील सिद्ध हुआ है तभी से बच्चों का पेट स्कूल जाने के नाम पर दर्द करने लगा है। स्वतंत्रता दिवस की सार्थकता क्या है, यह बच्चे क्या जाने। उन्हें लगता है कि आज फिर मिड डे मील भकोसना पड़ेगा। वे इसे अपने मील से लिंक्ड कर रहे हैं। वे बच्चे हैं। नहीं जानते कि किसको किससे लिंक्ड करना चाहिये। लिंक्ड करने की भी एक कला होती है। यह कला कल-आजकल में नहीं सीखी जा सकती। बताइये, पेट को स्कूल से लिंक्ड कर रहे हैं। उन्हें पेट को पेस्टीसाइड से लिंक्ड करना चाहिए। नहीं?
बच्चों का अपना सौन्दर्यशास्त्र है जिसमें अर्थशास्त्र नहीं आता। उनके सौन्दर्यशास्त्र में राजनीति भी नहीं आती। वे तो बस मील के लिए स्कूल जाते हैं। गरीब बच्चा जब-जब स्कूल जाता है तो ‘मील’ के लिए ही स्कूल जाता है और अध्यापकों से भी मिल आता है। ईश्वर जानता है कि गरीब बच्चा जब-जब स्कूल जाता है तो पाालटिक्स के पेट में दर्द उत्पन्न हो जाता है। जहां सारी कायनात उसे स्कूल भेजने में जोर लगाती है वहीं वह यह बेचारा छोटा सा, प्यारा सा, नन्हा सा होमो सेपियन्स अपना सारा जोर भूख मिटाने में लगाता है। बिना यह सोचे-समझे कि जो कुछ वह अपने डाइजेस्टिव सिस्टम की डिमांड पर खा रहा है वह सब कुछ उस सिस्टम की देन है जिसपर किसी का जोर नहीं। खुद सिस्टम बनाने वाले का भी नहीं। सिस्टम की नर्वसनेस देखिए, उसका नर्वस सिस्टम क्या देखते हैं।
पेट खाली हो और हाथ में तिरंगा हो तब भी देश के लिए भूखे-प्यासे रहकर मर मिटने का जज्बा पैदा हो सकता है। तब भी मुख से भारत माता की जय का नारा निकल सकता है। लेकिन ऐसी बहादुर मौत कौन चाहेगा जो स्कूल के बरामदे में जहरीला खाना खाने से मिलती हो। विचार है कि जब पेट खाली हो तो ज्ञान से पेट नहीं भरता। उत्तम विचार यह है कि पहले पेट का ही राम नाम सत्य करें ताकि न हो बांस और न बजे ससुरी बांसुरी।
बताइये, जिसे मील का पत्थर बनना था, उसे मिड डे मील खाकर मरना पड़ा। हास्य नहीं, हास्यास्पदता देखिए।
इस स्वतं़त्रता दिवस पर सरकारी स्कूल जाने वाले कम से कम कितने कर्णधारों को इस बात की गारन्टी दी जा सकती है कि उन्हें भविष्य में कीड़ों की तरह पेस्टीसाइड पीकर नहीं मरना पडे़गा और डेमाक्रेसी का डेकोरम बाकायदा मेन्टेन किया जायेगा। 
मी लार्ड! बच्चों को मरने से पूर्व कम से कम उतनी उम्र तो बख्श दी जाए, जितनी आजाद भारत की है। 
दैट्स आल मी लाॅर्ड।

  

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

अब लीजिए भी चचा !!



तो अब यह तय हो गया है कि घूसखोरी के बिना कोई चारा नहीं। लाचारी का नाम है घूस। आचार भी लाचार हो गये है इसके सामने। व्यवहार में घुस आयी है यह। आचार में टंकित हो गयी है इसकी छवि। मुस्कुराती हुयी। जैसे अभी-अभी नहा धोकर पूछने आयी हो गीले बालों को झटकती हुयी, कि कुछ लेंगे? और सम्मोहित सा व्यक्ति स्वीकारोक्ति में सिर को हिला भर देता है, जानते-बूझते हुये भी कि यह सम्मोहिनी है, अपने रूप-जाल में फंसा रही है, वह उसके जाल में फंस जाता है।
घूसखोरी कर्तव्य बन गयी है। आदमी सुबह तैयार होकर दफ्तर पहुँचता है, जरूरी फाइलें निबटाता है, लंच लेता है, घूस लेता है, और शाम को घर वापस लौट आता है। जो सज्जन दफ्तर में इस काम को नहीं कर पाते है, वे घर पर इस पवित्र कार्य को निबटाते हैं। आजकल इस कार्य को शोरूमों में किया जाने लगा है। लेने वाले की पसंद के अनुसार। देने वाले को तो देनी ही है।
नया-नया अधिकारी नये-नये शहर में स्थानान्तरित होकर आता है। अपरिचित शहर, अपरिचित शहरवासी, अपरिचित व्यवहार। सबसे बड़ी बात यह कि घूस का अपरिचित ढंग। पता नहीं लोगों के रीतिरिवाज कैसे हो। देते भी हैं या नहीं। लेकिन ऐसा भी कहीं होता है। लेने वाले भी हैं तो देने वाले भी हैं। सभी की पूँछ कहीं न कहीं दबी है। उसे उठाये रखने के लिये चारा डालना अति आवश्यक है। एक बकरी बाँधी जाती है, सत्ता के गलियारे में। शहरवाले अपने गले में ढोल लेकर हांका लगाते है जिसकी आवाज सत्ता के केन्द्र में बैठे हमारे अधिनायक ही सुन पाते है। सत्ता के मद में चूर ये अधिनायक भागते-भागते आते हैं और चारे का उपभोग कर शहर को उपकृत करते है। शहर भी खुश उसके अधिनायक भी खुश। लाचारी मिनटों में सदाचार में बदल जाती है। पुराना चोला उतर जाता है, नया धारण कर लिया जाता है। अभिवादन के तौर बदल जाते हैं, मुस्कुराने के तरीके बदल जाते हैं, संवेदनायें बदल जाती हैं, शर्म का पारा बदल जाते हैं, (अपना) उल्लू सीधा हो जाता है, साहब का मिज़ाज बदल जाता है। सब ससुरी एक चीज़ के लिये-घूस के लिये। बेबाक सी, बेताब सी, घूस के लिये।
वर्षों के तप के पश्चात घूसखोरी को लक्ष्य प्राप्त हुआ है। यानी इसे ईश्वर के दर्शन हुये है। अब यह प्रचंड वेग से ऊपर से नीचे तक फैल गयी है। दांये-बायें, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे सभी दिशाओं में। जिन्हें कभी दिशाओं का भान नहीं था, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। दिव्यदृष्टि वो, जो समय पर मिले। यहाँ तो मामला ही दृष्टियों का है। एक दिशा के लिये एक दृष्टि। चहुँ दिशाओं हेतु चहुँ ओर दृष्टियाँ। किन्तु आश्चर्य! कि सभी दृष्टियाँ एक ही दिशा की ओर लगी हैं। वह दिशाजो सभी दिशाओं से मिलकर बनी है। सभी ने इस दिशा के जन्म में, इसके निर्माण में कुछ न कुछ योगदान दिया जिसका प्रभाव सभी ने एकमत से स्वीकारा। जिसका प्रभावमण्डल जमकर छितरा। जिसके आलोक में सभी फले-फूले। प्रकान्ड पंडितों ने जिसे रिश्वत का नामकरण दिया। अनुवादकों ने विभिन्न भाषाओं में जिसके अनुवाद किये और यह अदना सा लेखक जिसे घूस के नाम से जानता हैं।
तो साथियों, तालियों के साथ इसका स्वागत कीजिये। अपनी-अपनी सीटों पर खड़े हो जाइये। बड़े साहब के साथ जो आ रही है, छोटे साहब के साथ जो जा रही है, बड़े बाबू के साथ जो गुनगुना रही है, छोटे बाबू के साथ जो गा रही है, चपड़ासी का मन जो बहला रही है, वह और कोई नहीं आपकी अपनी, तेरी-मेरी और उसकी, गोरी/चिट्टी, गोल-मटोल घूस ही है।
अजी साहब, ले लीजिये। हमें मालूम है आप नहीं लेते। पर थोड़ी तो लीजिये।अपने लिये न सही, बच्चों के लिये लीजिये। भाभी जी के लिये लीजिये। अजी लीजिये तो सही। अब तो सब चलता है जी। इसके बिना भी कहीं कुछ होता है साहब। अब तो इसे स्वीकृत कर ही देना चाहिये। अब तो दफ्तरों में इसकी फोटो टांग ही देनी चाहिये। कार्यालयों में इसका आदेश निकलवा देना चाहिये। मेज के ऊपर से न सही तो नीचे से ही लीजिये। चलिये अब उठाइये भी। इतना संकोच न कीजिये। कैश नहीं तो काइन्ड लीजिये। ओपन नहीं तो ब्लाइन्ड ही लीजिये। अब लीजिये भी चचा!


शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

सपने में आये अरविन्द केजरीवाल साहब!!


पत्नी जी ने रात को सपना देखा. और सपने में अरविन्द केजरीवाल साहब को देखा. सुबह उठते ही बोली कि आओ, पहले सपना सुनो, चाय बाद में बनाना. ऐसा सुअवसर खाकसार को कभी-कभी ही मिलता है जब पत्नी कहती है कि चाय अभी नहीं बनाओ और पास आकर बैठ जाओ. अतः मैं चुपचाप आकर उनके निकट बैठ गया.  अरविन्द केजरीवाल साहब अत्यंत चौकस व्यक्तितत्व के धनी हैं और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तो उनका चौकन्नापन देखते ही बनता है. केजरीवाल साहब को पहले केजरीवाल कहता था लेकिन पत्नी के आग्रह पर केजरीवाल जी कहना प्रारंभ कर दिया. कुछ समय तक केजरीवाल जी ही चला लेकिन जल्दी ही पत्नी का पैगाम एक दिन घर से दफ्तर में फोन के माध्यम से आया कि अब आप केजरीवाल साहब कहना प्रारंभ कर दीजिए. पत्नी जी को जब कोई काम निकलवाना होता है तो लीजिए/दीजिए कहना आरम्भ कर देती है जो कि अत्यंत कर्णप्रिय होता है अतः में भी उनकी सलाहों पर तत्काल अमल कर देना अपना पहला फ़र्ज़ समझता हूँ.
तो वर्तमान स्थिति यह थी कि पत्नी जी जो थीं वो सोफे पर सामने बैठी थी और खाकसार उनके समक्ष इस तरह बैठा था मानो भ्रष्टाचार के केजरीवाल-आरोप हम पर सिद्ध हो गए हों. इधर दफ्तर का समय हो चला था, अभी शेव भी बनानी थी और पत्नी जी केजरीवाल रुपी उस्तरा छोड़ने को तैयार नहीं थीं. ‘क्या हुआ, जल्दी कहो’ कहने की हिम्मत ना तो पहले थी और ना अब है. और अब तो मामला ही केजरीवाल साहब का था जिसे सुलझाने में नामालूम कितना वक़्त लगना था. पत्नी जी के मुंह से बोल फूटे तो सुनकर हम फूटें. देर से दफ्तर पंहुचेंगे तो क्या कारण बताएंगे- घर पर केजरीवाल साहब आये थे या सपने में आये थे, इसलिए लेट हो गया. आज की कैजुअल लीव लेने पर भी विचार् किया तो हाथों-हाथ इस समस्या ने भी दस्तक दे दी कि ‘रीज़न’ में क्या लिखूंगा- पत्नी जी की तबियत खराब या फिर पत्नी जी के सपने के कारण मेरी तबियत खराब.
आखिरकार आकाशवाणी हुयी. पत्नी जी के मुखारविंद से बोल फूटे- ‘रात सपने में देखा कि केजरीवाल साहब ने आपको ‘टारगेट’ करने का मन बना लिया है.’ सुनकर मैं नीचे गिरा जैसे कभी सत्यम के शेयर्स गिरे थे.   मैंने ऐसा क्या कर दिया जो केजरीवाल साहब ने मेरी सार्वजानिक छवि को उपकृत करने का मन बना लिया. क्या शेष सभी के भ्रष्टाचार की पोल खोली जा चुकी है जो मेरा नंबर आ गया. मैं तो एक छोटे से शहर में रहता हूँ जिसे साल में सिर्फ ६ सिलेंडर सबसिडी के साथ मिलते हैं, मेरी गैस क्यों निकालते हो भाई?, क्या दिल्ली-मुंबई वालों का अभिनन्दन करने का सद्कार्य पूर्ण हो गया जो मुझ जैसे गंवार को सम्मानित करने का मन बना लिया. हैरानी की बात यह थी कि केजरीवाल साहब उस कमजोर व्यक्ति को ललकारने का मन बना रहे थे जो कि खुद पत्नी के ललकारने हेतु अभिशप्त और भयभीत है. क्या उन्हें लगता है कि महीने में दो-चार पैसे खा लेना भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है. टी.ए. बिलों में चार सौ-पांच सौ का हेर-फेर करना भ्रष्टाचार कब से हो गया, अंकल? मैं तो रहता भी ऐसे मोहल्ले में हूँ जिसमे भ्रष्टाचार भी सब्जी की रेहडी के स्तर का होता है. महिला ने दो किलो आलू लिए और दो मिर्ची अपनी ओर खिसका लीं, वाले स्तर का. उस स्तर का नहीं कि पांच सौ ग्राम बैंगन तुलवाये और सात सौ ग्राम का कद्दू पार कर लिया.
पत्नी जी कहती हैं कि आज की तारीख में भ्रष्टाचार कौन नहीं करता, वही नहीं करता जिसे मौका नहीं मिलता. पत्नी जी भ्रष्टाचार की समर्थक नहीं है लेकिन घर पर चाय मुझे बनानी पड़ती है. यह भ्रष्टाचार है लेकिन पत्नी जी नहीं मानती. दफ्तर में जो चाय आती है उसका भुगतान हम कर्मचारी रो-रोकर कर भी नहीं करते हैं. पत्नी कहती है कि यह भ्रष्टाचार है, लेकिन मेरा मन नहीं मानता. हमारे बीच यही चिखचिख चलती रहती है.
जिस दिन की यह घटना है उस दिन मैं दफ्तर नहीं गया. कैसे जाता? जिसको केजरीवाल साहब टारगेट बना लेते हैं वह कहीं जाकर आराम से सो सकता है भला? जिन लोगों ने वास्तव में पैसा खाकर डकार भी नहीं मारी है उनका क्या हश्र होता होगा!

बुधवार, 21 मार्च 2012

उनकी योजना


पूर्ण गंभीरता और ईमानदारी के साथ उन्होंने मुझे सूचना दी कि वे अब और सहन नहीं कर सकते तथा शीघ्र ही रिश्वत लेना प्रारम्भ कर रहे हैं।
जिस समय और जिस क्षण वे रिश्वत काया में प्रवेश करने की सूचना मुझे प्रदान कर रहे थे, आप सोच भी नहीं सकते कि कितने दुखी थे। सम्भवतः यह दुख उन्हें विलम्ब से इस 'प्लान' को लेने पर था। उनसे पूर्व उनके समस्त सगे-सम्बन्धियों तथा मित्र इस प्लान को ले चुके थे तथा अच्छी-खासी प्रीमियम प्राप्त कर रहे थे।
वे एक बडे़ सरकारी विभाग में अधिकारी थे और जिस लक्ष्य की घोषणा वे अब कर रहे थे, नियमानुसार उन्हें तभी कर देनी थी, जब उन्होंने इस पद पर अपनी योगदान आखया प्रस्तुत की थी। उनके जैसे सम्मानित अधिकारी से ऐसी अपेक्षा की जाती थी। उनके नियन्त्रण में आने वाले समस्त कर्मचारी जब पूर्ण निष्ठा के साथ रिश्वत लेने के अपने दायित्व को बरसों से निभा रहे थे तो उनपर ही ऐसी कौन सी विपदा टपकी थी जो वे अब तक लोकतंत्र की इस कामयाब योजना से विमुख चल रहे थे।

मैंने उनके चेहरे की आरे ध्यान से देखा। जब वे कह रहे थे तो कह रहे थे। उनके कहे का अर्थ स्पष्ट था। कल से वे रिश्वत लेना आरम्भ करने वाले थे। अब कोई अन्ना या लोकपाल उनके रास्ते में नहीं आने वाला था। आता भी तो वे उसे लांघने का हौसला अब रखते थे। कम से कम उनकी मुखमुद्रा से तो यही प्रतीत होता था।
उन्होंने अब तक इस रिच्च्वती हवन में सामग्री क्यों नहीं डाली थी, इस बारे में इतिहास मौन था। वे स्वयं मौन थे। हमें भी मौन रहना था। इसे प्रारम्भ करने के पीछे उनकी क्या विवशता थी, यह कोई रिश्वतखोर ही बतला सकता था।
मैंने घड़ी देखी। शाम के पांच बजने को थे। पता नहीं, वे आज ही इस पावन कार्य को प्रारम्भ करेंगे अथवा इस मैटर को कल के मुखय एजेण्डे में रखेंगे। मैं सोच रहा था। ऑफिस बंद होने के बाद वे किसी अन्य स्थान पर सोमरस का पान करने जाते थे। हो सकता है कि अपनी अन्य घोद्गाणाओं की भांति वे इसकी भी उद्‌घोद्गाणा  वहीं से करें। और इस योजना का भी अन्ततः वही हश्र हो, जो उनकी अन्य योजनाओं को हुआ।
बहरहाल, वे रिश्वत लेना प्रारम्भ करने वाले हैं, इस पर हुर्रा..ऽ..ऽ कहूं या ऊह..ला...ला.., कुछ समझ नहीं आ रहा है । हां, यह जरूर बताना चाहूंगा कि जैसे ही मेरी निगाह उनके ललाट पर गयी, उस पर अंग्रेजी का v बना हुआ था।

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

दो अक्तूबर आया..दो अक्तूबर गया..







आज दो अक्तूबर हैं। यह बात मुझे कल रात ही मालूम हो गयी थी। बल्कि दो.चार रोज पहले से ही मैं चौकस हो गया था कि दो अक्तूबर आने वाला है। आज सुबह जब दो अक्तूबर आ गया तो मैंने सोचा कि इस घर में बस मुझे ही मालूम है कि आज दो अक्तूबर है। लेकिन मेरी पत्नी को भी मालूम था कि आज दो अक्तूबर है। बल्कि उसका कहना तो यह था कि उसे सितम्बर में ही मालूम था कि दो अक्तूबर आने वाला है। इसी बात पर मेरी उससे कलह लगभग रोज होती है कि उसे वही बात जो होनी होती है, वह पहले से ही मालूम हो जाती है। इस बार चूंकि यह बात मुझे उससे पहले मालूम थी कि आज दो अक्तूबर है, तो यह उससे हज़म नहीं हुई। इसलिए वह सुबह-सुबह मुझ पर झल्ला गयी। कोई और दिन होता तो मैं तुरन्त सरेण्डर कर देता यह सोचकर कि वह लड़ने का बहाना ढूंढती है। लेकिन आज वजह दूसरी थी। आज मैंने यह सोचकर सरेण्डर किया कि आज दो अक्तूबर है। दो अक्तूबर का दिन लड़ने के लिए नहीं होता है। लड़ने के लिए एक अक्तूबर है, तीन अक्तूबर है लेकिन दो अक्तूबर नहीं।
मेरा विचार यह था कि मैं दो अक्तूबर को गांधी जी की कोई मूवी देखूंगा। मेरा यह भी विचार था कि मैं गांधी जी पर कोई पुस्तक पढ़ूँगा गांधी जी पर न पढ़ सका तो गांधी जी की ही पढ़ूँगा । दिन में गांधी की तरह सादगी से रहूंगा। सादगी से भोजन करूंगा, दो-चार गांधीवादी चेहरे देखूंगा और कुल मिलाकर सादगीपूर्ण दिन गुजारूंगा। 
मैंने इसके लिए प्रयास भी किये थे। सुबह होते ही मैंने पत्नी का चाय बनाकर दी थी और उसमें उतनी ही शक्कर डाली थी जितनी उसे आवश्यकता थी। लेकिन मैं यह शक्कर उसकी ज़बान में न डाल सका।
इसके बाद मैंने छुट्टी का दिन होने के बावजूद जल्दी नहा लेने का उपक्रम किया। उपक्रम ही क्यो, पूरी प्रक्रिया कर डाली थी। मेरा विचार था कि गांधी जी प्रातःकाल ही स्नानादि से निबट लेते होंगे। मुझे कम से कम इस कार्य में तो उनका अनुसरण करना ही चाहिए। आज दो अक्तूबर जो था।
नहाने के उपरान्त मैंने राम का भजन किया। वे रघुपति..राघव..राजाराम का जाप करते थे। मुझे भजन इसके आगे आता नहीं था, सो इस सम्बन्ध में जो भी सत्साहित्य पूजाघर में उपलब्ध था, उसे ही पूर्ण मनोयोग से पढ़ा और नाश्ता करने के लिए पत्नी के पास किचन में आ गया।
पत्नी जो थी, वह नाश्ता करने के मूड में तो थी, किन्तु बनाने के मूड में कतई नहीं दिखी। वह आज संडे मनाने के मूड में थी और मैं दो अक्तूबर। दिन एक ही था लेकिन हम दोनों उसे अलग-अलग नज़रिए से देख रहे थे। मेरे लिए आज दो अक्तूबर था किन्तु उसके लिए आज संडे था। मैं सादगी से दिन मनाना चाहता था और वह किसी रेस्तरां में जाकर दिन की शुरूआत करना चाहती थी। मुझे दो अक्तूबर दिखाई दे रहा था, उसे संडे। मैं कह रहा था कि साल में एक बार तो आता है दो अक्तूबर। वह कह रही थी कि सप्ताह में एक बार तो आता है संडे। इस बार हाथ से गया तो फिर अगले सप्ताह ही आयेगा। उससे पहले नहीं। उसकी बात भी सही थी। आज हाथ से निकलने के बाद संडे जल्दी तो आने वाला नहीं था। सात दिनों बाद ही आता। सात दिन से पहले तो हरगिज नहीं आता। मेरे कहने से क्या, गांधी जी के कहने से भी नहीं आता। अब क्या होना था। मैं गांधी को फालो कर रहा था किन्तु वह 'बा' नहीं थी इसलिए गांधी जी को फालो करने को तैयार नहीं थी। लिहाज़ा, गांधी जी तो हाथ से निकल ही गये थे, दो अक्तूबर भी फिसलने लगा।
दोपहर में तो हद हो गयी। मैं लगातार चैनल पर चैनल बदलता रहा कि कहीं गांधी जी दिखाई दे जाएं। लेकिन किसी चैनल पर गांधी जी नहीं दिखे। जो लोग गांधी जी का नाम लेते दिखे भी, वे मुझे कहीं से भी गांधीमय नहीं लगे। शायद राम जी की तरह गांधी जी भी बनवास पर चले गये थे।
शाम को मैं इस चक्कर में था कि गांधी जी के किसी भक्त से भेंट करूं और अपना दिन जैसे भी कटा हो रात तो गांधी जी को सिमरन करके काटूं। लेकिन ऐसा संभव न हो सका। एक ऐसे मित्र मिलने आ गये जिनका गांधी जी के नाम से तो क्या, स्वभाव से भी दूर-दराज का कोई रिश्ता फिट नहीं होता था। उलटे, वे गांधी जी के नाम से ही बिदकते थे। मैंने उन्हें दो अक्तूबर की शुभकामनाएं दीं तो वे हिंसा पर उतर आये। दो अक्तूबर ना भी होता तो भी मैं हिंसा का उत्तर हिंसा से नहीं दे पाता। फिर आज तो गांधी जयंती थी। 

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

बस, तू कब आयेगी!



बस की प्रतीक्षा में खड़ा यात्री स्वयं से पूछता है- बस, तू कब आएगी?
दुनिया में बस ही एक ऐसी चीज है जिसके बारे में प्रतीक्षारत् यात्री कभी नहीं कहता, कि अब ‘बस’ भी कर। मत आ। वह प्रतीक्षा करता रहता है, अनवरत्। एक बस आती है, और चली जाती है। नहीं रूकती। दूसरी आती है और चली जाती है। भरी हुई है, कैसे रूके। यात्री झींकता है। पर प्रतीक्षा करना उसकी मजबूरी है। उसकी किस्मत में प्रतीक्षा करना लिखा है। वह चलता-फिरता प्रतीक्षालय है जिसमें बैठा वह अकेला प्रतीक्षा करता रहता है बस की। उसे लगता है कि वह सारी उम्र प्रतीक्षा करता रहेगा उस बस की, जो आती है और चली जाती है। कभी रूकती है तो भरी हुई होती है और जब नहीं रूकती तो उसे मानना पड़ता है कि भरी हुई होगी। वह अगली बस की प्रतीक्षा करने लगता है, जिसके बारे में उसका यह मानना होता है कि वह भरी हुई नहीं होगी, खाली होगी। लेकिन वह बस कभी नहीं आती जो खाली हो। आती है तो खाली नहीं होती। खाली होती है तो रूकती नहीं। रूकती है तो कोई सीट खाली नहीं होती।
वह प्रतीक्षारत् है, किसी खाली बस के लिए। 
वह कल्पना करता है कि बस उसके पास आकर रूकेगी। कण्डक्टर मुस्कुराकर उससे पूछेगा, कहां जाना है? 
यात्री कहेगा, मोतीचूर। 
कण्डक्टर जवाब देगा, आइये बैठिये। यह बस तो सीधे मोतीचूर तक ही जा रही है। 
फिर वह बस में चढे़गा किसी शाही अंदाज में। बस, बिलकुल खाली होगी, जैसे उसी के लिए बनी हो। वह सबसे आगे वाली सीट पर जाकर बैठ जायेगा। फिर तुरन्त उठेगा और पीछे वाली सीट पर बैठ जायेगा। उसे वहां भी चैन नहीं आयेगा तो वह कण्डक्टर के साथ बैठ जायेगा। वह चालक की सीट पर भी बैठना चाहेगा। अंततः, वह खड़ा होकर यात्रा करेगा, जैसे कि वह प्रतिदिन करता है।
परन्तु ऐसा नहीं होता। बस नहीं आती बहुत देर तक। आती है, तो रूकती नहीं। रूकती है तो तो खाली नहीं होती। खाली होती है तो मोतीचूर नहीं जा रही होती। अर्थात कुछ न कुछ ऐसा होता है कि वह प्रतीक्षा करता रह जाता है, अगली बस की। अगली बस, जो नामालूम कब आयेगी। आयेगी तो रूकेगी नहीं। रूकेगी तो चांदपुर की होगी, वहां की तो बिलकुल ही नहीं होगी, जहां पर वह जा रहा होगा।
एक बस जीवन भर यात्री को प्रतीक्षा कराती है और दिन में सैकड़ों यात्री जीवन भर बस की प्रतीक्षा करते हैं और एक दूसरे से पूछते हैं - बस, तू कब आयेगी? ऐरी बस, तू कब आयेगी? बस री, तू कब आवेगी? यही जीवन की बस है।


मंगलवार, 24 अगस्त 2010

मुल्क की आज़ादी और खाकसार की दाढ़ का दर्द

शीर्षक खाकसार की दाढ़ के दर्द की तरह कुछ लम्बा हो गया है लेकिन डाक्टर का कहना है कि घबराने वाली कोई बात नहीं है।
जब जांच के बाद डाक्टर अपनी मुखमुद्रा सांप कांटे वाले व्यक्ति की तरह बना लेता है या उस बैंक कर्मी की तरह बना लेता है जिसका एरियर उसे साढे़ तीन साल बाद भी न मिले तो रोगी का रक्तचाप बढ़ जाता है और वह घबराकर पूछता है कि डाक्टर साहब, घबराने वाली कोई बात तो नहीं है? यानी इजाजत दे ंतो घबराना शुरू करूं।
डाक्टर अपना कैंची हथौड़ा एक तरफ जाकर मांजते हुए जवाब देता है- नहीं, घबराने वाली कोई बात नहीं है।
रोगी को सांत्वना मिलती हैं। वह समझ जाता है कि घबराने वाली कोई बात नहीं है।
बिलकुल वैसे ही जैसे उत्तर में गोला बारूद चल रहा है, दक्षिण में नक्सलवाद ठांठूं कर रहा हैं, आदमी की जान लेना शगल मान लिया गया है, रिश्वत दिये लिये बिना कोई काम करने को राजी नहीं है, और... और घबराने वाली कोई बात नहीं है।
दाढ़ में दर्द है कि बढ़ता ही जा रहा है। डाक्टर कहता है कि करार जल्दी आ जायेगा। मैं जानता हॅूं कि करार तब आयेगा जब डाक्टर के साथ पूरे जबड़े का करार करूंगा।
डाक्टर सलाह देता है कि रूट कैनाल करा लो। उसकी नीयत जड़ खोदने में है। मैं मना कर देता हॅंू । मैं बीमारी की जड़ तक पहुंचना चाहता हॅू। जैसे प्रधानमंत्री कश्मीर पहंुच गये। दर्द असहनीय हो रहा है। मैं डाक्टर से कहता हूं कि जल्दी से दाढ़ निकाल लो, मैं इसे कोई राजनीतिक रंग नहीं देना चाहता। डाक्टर राजी हो जाता है। थोड़ी देर बाद दाढ़ को ससम्मान निकाल दिया जाता है जैसे सीरीज हारने के बाद कोच को ससम्मान निकाल दिया जाता है।
दर्द अभी भी बदस्तूर जारी है। मैं डाक्टर के पास दोबारा जाकर पूछता हूं कि घबराने वाली कोई बात तो नहीं। डाक्टर अपना चिमटा हथौड़ा हाथ में लेकर कहता है कि नहीं, घबराने वाली कोई बात नहंी है।
मैं बताता हूं कि दर्द तो अभी भी हो रहा है। डाक्टर अवगत कराता है कि दर्द मसकुलर है। देखिये न, दर्द दर्द में अंतर है। पहले पेन था अब मसकुलर पेन है। मैं दर्द के मारे बिलबिला रहा हॅंू। डाक्टर नाराज होता है। आप तीन घंटे में ही परेशान हो गये। सोनिया जी को देखिये, साढ़े तीन साल से ममता-मसकुलर झेल रही है।
मैं बोल नहीं सकता था, इसलिये नहीं पूछा कि कौन सोनिया जी? सिर्फ आइडिया लगाकर रह गया कि कौन सी सोनिया जी।
डाक्टर ने मुझे च्युंगम चबाने की सलाह दी। बोला, मसकुलर में फायदा होगा।
दो घंटे बाद मैंने डाक्टर को फोन किया-डाक्टर साहब, रबड़ चबाचबाकर थक गया हूं, दर्द में कोई आराम नहीं है। ऊपर से च्यंूगम का खर्चा और बढ़ गया है। 
उधर से डाक्टर के रोने की सी आवाज आयी- मुल्क का मसकुलर नहीं है जो च्यंगम की तरह लम्बा खींचने पर आराम होगा। इसे तो चबाये जाओ। कलमाड़ी ने चाहा तो जरूर लाभ होगा।
मैं इसे राजनीतिक रंग नहीं देना चाहता था। सो पूछा- डाक्टर साहब, घबराने वाली तो कोई बात नहंीं है।
डाक्टर ने फोन पटक दिया।
आप से ही पूछता हूं - घबराने वाली कोई बात तो नहीं?